
फागुन की पहली आहट पर जब धरा मुस्काती है,
पलाश की अग्नि-सी लाली वन-वन जगमगाती है।
टेसू के फूलों से सजकर डालें इठलाती हैं,
ज्यों होली के स्वागत में रंगों की थाली आती है।
इनकी पंखुड़ियों में जैसे सूरज उतर आया हो,
सूनी पगडंडी पर मानो प्रेम नया छाया हो।
इनसे ही घुलते थे पहले रंग सुनहरे पानी में,
सराबोर होती थी टोली हंसी भरे फागुनी गाने में।
पलाश कहे — “रंगों का अर्थ मिलन और अपनापन है,”
होली का सच्चा संदेश यही स्नेहिल आलिंगन है।
जब-जब धरती पर रिश्तों की धूल जम जाती है,
पलाश की ज्वाला फिर से प्रीत जगाती है।
आओ इस होली पर हम भी ऐसा रंग लगाएँ,
मन के सूखे वन में पलाश-सा प्रेम खिलाएँ।
अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)




