
मानव का उत्थान, पृथक क्या जग से होता।
स्वार्थ पूर्ति के बीज, न जाने क्यों वह बोता।।
अहम् भाव से त्रस्त, युद्ध में सबको झोंका।
धरती माँ के वक्ष,मृत्यु का खंजर भोंका।।१।
सबका हो उत्थान, प्रकृति की ईहा इतनी।
औरों की कर फिक्र, करें मनु निज की जितनी।।
करके ढोर हलाल, बना तू खूब चटोरा।
युद्ध रूप में मौत, भरे अब रक्त कटोरा।।२।
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश



