साहित्य

ये रिश्तों की मर्यादा भूलकर आपस में लड़वाते है

कुलदीप सिंह रुहेला

ये रिश्तों की मर्यादा भूलकर क्यों आपस में लड़ जाते हैं,
जेहाद के नारे देकर क्यों मासूमों को भरमाते हैं।
मीठे शब्दों की ओट में क्यों छल का जाल बिछाते हो,
भटकी राहों के अंधेरों में क्यों जीवन दीप बुझाते हो।

ये धरती ऋषियों की वाणी, ये संस्कृति का मान है,
नारी यहाँ की शक्ति, शील और मर्यादा की पहचान है।
जो छल से उसको तोड़ें, वो मानवता के दोषी हैं,
धर्म नहीं वो अधर्म है, जो दिलों में नफ़रत बोती है।

उठो युवाओं! सत्य की मशाल जलानी होगी,
भारत की अस्मिता फिर से जगानी होगी।
ना छल का जाल चलेगा, ना झूठ की तलवार चलेगी,
इस पावन धरती पर केवल सत्य की हुंकार चलेगी।

वीर शिवा की गाथाएँ फिर से याद दिलाएँगी,
राणा की प्रतिज्ञाएँ फिर से रक्त जगाएँगी।
मर्यादा की रक्षा को जब सिंह पुकार उठेगा,
हर अन्याय के आगे फिर भारत खड़ा दिखेगा।

नारी की गरिमा की रक्षा हमारा अभिमान रहे,
धर्म नहीं, मानवता ही सबसे बड़ा सम्मान रहे।
मिलकर ऐसा भारत गढ़ें जहाँ सत्य का राज हो,
जहाँ प्रेम की गंगा बहे और वीरों का अंदाज़ हो।

कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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