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संघर्ष से शिखर तक

दिनेश पाल सिंह 'दिव्य'

धूप में तपकर जो छाँव बनाया करता था,
अपनी हर चाह को दाँव लगाया करता था।
रातों की नींदें गिरवी रख दी जिसने,
वही पिता बेटे का कल सजाया करता था॥

छोटे-छोटे सपनों को आँखों में बोया था,
हर मुश्किल को हँसकर चुपचाप संजोया था।
अंश की हर मुस्कान में अपना सुख देखा,
अपने हिस्से का हर दर्द भी उसने ही ढोया था॥

आज वही अंश बना है उजियारा घर का,
नाम रोशन कर गया है हर इक नगर का।
कम्पनी में चयन की जब खबर सुनाई दी,
झूम उठा मन जैसे साक्षात् हो असर का॥

पिता की आँखों में जो नमी छलक आई,
वो हार नहीं, जीवन की सच्ची कमाई।
हर आँसू कह रहा था गर्व की कहानी—
“मेरी मेहनत ने आज सच्ची राह दिखाई”॥

वो चुप था मगर हर धड़कन गा रही थी,
हर झुर्री एक विजय गाथा सजा रही थी।
बेटे की सफलता में खुद को पा लिया उसने,
किस्मत भी उसके चरणों में सिर झुका रही थी॥

न कोई ताज, न कोई सिंहासन चाहिए,
बस बेटे का उज्ज्वल भविष्य ही अरमान चाहिए।
आज गर्व से सिर ऊँचा कर कहता है पिता—
“मुझे और क्या, अब बस भगवान का वरदान चाहिए”॥

जिसे गिरकर संभलना सिखाया था कभी,
आज उसी ने उड़ना सिखा दिया सभी।
बेटे की इस जीत में पिता यूँ खिल उठा,
जैसे खुद ईश्वर ने आशीष दिया अभी॥

स्वरचित मौलिक
*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*

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