
शिव संग शिवा शशि मस्तक जो शुचि शीतलता अति पावन है।
विष कंठ त्रिशूल गहे लगती सबको छवि लोक लुभावन है।।
गल नाग जटा सिर गंग सु-धार बनी निज मोक्ष सु-साधन हैं।
कर में डमरू कटि में मृग छाल सदा चढ़ते वृषवाहन हैं।।
शिव का दरबार सजा शुभधा मन मंदिर दृश्य सुहावन है।
फल-फूल चढ़े घृत दूध दही परिवेश बना अति पावन है।।
तन भस्म लगी सिर गंग बहे जग मोक्ष बनी निज साधन है।
जयकार बढ़ी बम बोल रहे हर का कर ध्यान अराधन है।।
नित जाप करें जग में शिव का जिनको वरदायक सब हैं कहते।
प्रभु राम बने वह सेवक हैं उर भक्ति सदा उनकी गहते।।
जिनके बल की जग थाह नहीं कलि काल कराल रहे ढहते।
सबके हिय में शिव वास करें भर नेह बँधें अभिधा रहते।।
पहचान रही तुमको प्रभु जी तुम घाव सदा सबके सिलते।
जग के कण ही कण वास रहे बिन आयुष पात नहीं हिलते।।
धन-धान्य भरा जग में शिव जी तुम्हरी किरपा बिन को मिलते।
दुखिया मन से निज आस करूंँ उर पुष्प रहें सुख के खिलते।।
कर में जल पात्र लिए शिव जी शरणागत हो तव द्वार खड़ी।
तुम ज्ञान अपार भरो उर में मम छंद जरूरत आन पड़ी।।
शुचि भाव भरी बरसात करो चमके झर बूंँदन हीर लड़ी।
उर जागृत चेतनता कर दो प्रभु पूरित हो यह आस बड़ी।।
घनघोर घटा उमड़े-घुमड़े पड़ती बुंँदिया जब सावन की।
तब प्रीत पराग झरे मन में सुधि आवत है शिव आवन की।।
पथ जोहत-जोहत हार गई असुवांँ ढर के नित आंँखन से।
मन में बस चाह बसी इतनी मिलना इसको नित है उनसे।।
डॉ गीता पाण्डेय “अपराजिता”
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश




