साहित्य

ठंड

अमरेन्द्र

कपकपाती ठंड में भी,
वो मजदूर काम कर रहे।
साहब लिपटे हैं रजाई में,
मगर वो सिर पर हैं ईंट उठा रहे।

क्या करे बेचारा वो,
जगजाहिर है, मजबूर है।
घर में खाने की खर्ची नहीं,
इसलिए बोझ उठाने को तैयार है।

बदन का पुर्जा-पुर्जा हिल रहा,
ऊपर से ये डरावनी ठंड है।
मजदूर बेचारा क्या करे,
रोजी-रोटी की सवाल है।

न जाने इस ठंड में,
कितने दुनिया को अलविदा कह गए।
वो जानता है इस बात को,
पर क्या करे, भूख की आग तीव्र है।

घर लौटा बेचारा शाम को,
माँ बोली बुलाओ मेरे लाल को।
जब आया बेचारा सामने,
मांँ सिधारी परलोक को।

अब ब्राह्मण आयेगा लूटेगा,
सूदखोर सौदा करेगा।
इस लोक में दुख झेली बेचारी,
अब ब्राह्मण स्वर्ग उसे भेजेगा।

धुर्त किस्मत की बात कह रहे,
उल्टा उसे समझा रहे।
शोषण की जंजीर कसकर,
उसपर जुल्म पर जुल्म ढाह रहे।

अमरेन्द्र
पटना, बिहार।

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