
हथेली की दरकी रेखा में, प्रारब्ध लिखा विस्तार।
सूक्ष्म तंतुओं में उलझा है, जीवन का व्यवहार।
माया के झीने जालों में, भटके चंचल प्राण।
सत्य खोजने निकल पड़ा है, मानव का अभियान।
कभी ईश्वर की चाह जगे, कभी जग की प्यास।
कभी देह का मोह प्रबल हो, कभी माया का वास।
कभी प्रेम का कोमल स्पर्श, मन को दे विस्तार।
कभी द्वेष के काले बादल, कर दें जीवन भार।
युग-युग से प्रश्नों का वन, मन में गहरा छाया।
“मैं कौन हूँ” यह जानने में, जीवन बीता साया।
चाँद-सितारों की राहों को, मानव ने है नापा।
सूक्ष्म कणों में भी उसने, सृष्टि-रहस्य को झाँका।
जब भीतर “अहं ब्रह्मास्मि” का, जागे सत्य प्रकाश।
टूटे मिथ्या अहंकार तब, मिटे मनो-अभिलाष।
ब्रह्म वही जो शाश्वत सत्य, जिसमें सबका वास।
‘मैं’ और ‘तू’ जब लय हो जाएँ, बचे परम प्रकाश।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




