साहित्य

तुम खुद चिराग बन मिटाओ जीवन अंधकार को

एस के कपूर"श्री हंस"

1
आना-जाना जिंदगी का यही एक अफसाना है।
दुनिया में नहीं यहां किसीका कोई अमर ठिकाना है।।
यह छोटी सी जिंदगी क्यों तू रो कर है गुजारता।
हंसता जबआदमी तभी साथ हंसता यह जमाना है।।
2
कभी हंसती-रोती कभी ऐसी या वैसी हो जाती है।
जिस नज़र से देखो यह जिंदगी वैसी हो जाती है।।
मत डूबे रहो आप बस इस खोखले दिखावेपन में।
खुशी बांटना सीख लो देखेंगे जिंदगी कैसी होजाती है।।
3
खुद चिराग बन कर जलो मिटाने अपने अंधकार को।
तभी सफल मानव बन अलविदा कहोगे संसार को।।
तेरी खुशहाली तेरी उदासी निर्भर करती मनोदशा पर।
आनंद तभी आदमी जिए करके परमार्थ सरोकर को।।
4
कल किसने देखा कि बस अपने आज में खुश रहो।
किसी पर निर्भर नहीं बस अपनेअंदाज में खुश रहो।।
एक ही मिला जीवन जिओ मिसाल बेमिसाल बनकर।
जिंदगी में समस्या नहीं बन कर जवाब में खुश रहो।।
रचयिता।।एस के कपूर”श्री हंस”
बरेली।।
©. @. skkapoor
सर्वाधिकार सुरक्षित

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