
ज़िन्दगी अब और नहीं
तेरी दग़ा-बाज़ी का ठौर नहीं
प्यार में दुश्मनी का एहसास
और नहीं बस और नहीं
रिश्तो को परखा है मैंने
रिश्ता कोई अनमोल नहीं
क़दम क़दम पर इसमें दग़ा है
ऐसी दिल में ना चोट कोई
ख़ून के आंँसू रो कर देखें
दिल सा कोई पुर-ज़ोर नहीं
क़समे वादे झूठे हैं सब
प्यार का कोई ठोर नहीं
पैसों का सब खेल है बंदे
इंसानों का मोल नहीं
ग़ज़ब तिजारत है ये मोहब्बत
धोखा है कुछ और नहीं
दिल का सौदा करने बैठे
दिल सा कोई कमज़ोर नहीं
हार चुके हैं सारा जीवन
प्यार पर कोई ज़ोर नहीं
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




