साहित्य

विकराल वक्त

सुभाष हेमबाबू "नादान "

आंधियों का जोर भी है
आपदाओं का शोर भी है
अट्टहास कर रहा उन्माद अब
अंधकार घन घोर भी है
माना कि दया करुणा अब दिलों से दूर है
किंतु अन्तस में अभी अरदास जीवित है
जल रही देखो वसुंधरा
आसमान भी लाल है
आदमी की हैवानियत का
रूप भयंकर विकराल है
किंतु मनीषियों ने मानवता अभी त्यागी नहीं
मानुष में संवेदनाओं का विश्वास जीवित है
सरहद पर जाकर देखिए
काल मुंह बाये खडा़ है
जेहाद का जुल्मी दानव
अपनी जिद पर अडा़ है
नहीं हैऔकात कि मिटा दे सारे जहां को
इंसा में उम्मीदों का एहसास जीवित है
संवेदनाओं की शून्यता
का ही दुष्परिणाम है
दिलों में बढ़ती दरारें
जमाने में अब आम है
फिर भी दिल के किसी कौने में छुपा
प्रेम मोहब्बत का उल्लास जीवित है।
अहं की आंखों में देखो
बह रही खूनी धार है
गिन तो जरा अपनी सांसें
बस यही कि दो चार हैं
रुक जरा आ रहा है वक्त तेरे सर्वनाश का
कुदरत के खेल का अभी विश्वास जीवित है
होगी फिर भोर सुहानी
चिड़ियों का कलरव होगा
धरती पहनेंगी चूनर धानी
जगमग फिर नभ होगा
प्रीत की रीत उगेगी फिर मानस मन में
इंसा के दिल में अभी मधुमास जीवित है।

सुभाष हेमबाबू “नादान ”
महोबा

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