
कुंडलिया १ –
कविता अनुभव की तपन, शब्द जाल ना होय।
सच्ची शोभित वेदना, मन को सींचे सोय।।
मन को सींचे सोय, चित्र आँखों में खींचे।
गागर सागर भरत, मरुस्थल भी वो सींचे।।
कह ‘सागर’ सुनु विश्व, सत्य की होती सविता।
उर की निकले बात, वही है श्रेष्ठ कविता।।
कुंडलिया २ –
कविता सोई आत्मा, देवे तुरत जगाय।
जड़ता में गति भरत है, नूतन राह दिखाय।।
नूतन राह दिखाय, द्रोह अन्यायी जावे।
मानुष को इन्सान, श्रेष्ठ वह सदा बनावे।।
कह ‘सागर’ मति शुद्ध, हृदय की शक्ति अमिता।
जग को दे नव प्राण, जगावे सोई कविता।।
छंद वैशिष्ट्य – कुंडलिया का शिल्प
यह रचना हिंदी साहित्य के अत्यंत प्रतिष्ठित और अनुशासित ‘कुंडलिया छंद’ में निबद्ध है, जो भाव और गणितीय लय का एक अद्भुत संगम है। यह एक ‘विषम मात्रिक छंद’ है, जिसका निर्माण एक दोहा और एक रोला के मेल से होता है, जिसमें कुल छह पंक्तियाँ होती हैं। इसकी शिल्पगत सुंदरता यह है कि इसमें प्रत्येक पंक्ति २४ मात्राओं की होती है, जहाँ दोहे के चरणों में १३ और ११ पर तथा रोला की पंक्तियों में ११ और १३ मात्राओं पर यति का नियमबद्ध निर्वाह किया जाता है। इसकी सबसे अनूठी विशेषता ‘दोहराव की कड़ी’ और ‘कुंडल स्वरूप’ है, जहाँ दोहे का अंतिम चरण ही रोला की प्रथम पंक्ति का आधार बनता है, वहीं जिस शब्द से छंद का प्रारंभ होता है, समापन भी उसी शब्द पर अनिवार्य रूप से होता है। शब्दों का यही चक्रीय प्रवाह इसे एक ‘कुंडली’ के समान पूर्णता और विलक्षण गति प्रदान करता है।
लेखनी चलती रहे, संवेदनाएँ जीवित रहें। आप सभी को विश्व कविता दिवस की हार्दिक मंगलकामनाएँ। 🙏💐
©® डॉ. विद्यासागर उपाध्याय



