साहित्य, विज्ञान और अध्यात्म का त्रिवेणी संगम: गोरखपुर में आचार्य संगति एवं कवि सम्मेलन संपन्न
हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, प्रत्येक युद्ध का अंत समझौते से ही होता है:आचार्य धर्मेन्द्र

गोरखपुर। बाबा गोरक्षनाथ की पावन नगरी गोरखपुर में आचार्यकुल एवं श्री देव दीप साहित्य संगम, गोरखपुर के संयुक्त तत्वावधान में श्री विश्वकर्मा मंदिर, मानसरोवर, गोरखनाथ परिसर में आयोजित आचार्य संगति एवं कवि सम्मेलन एक दिव्य एवं भावपूर्ण आयोजन के रूप में संपन्न हुआ। आचार्यकुल के राष्ट्रीय संयोजक धर्मेन्द्र जी के कुशल निर्देशन एवं अध्यक्षता में सम्पन्न इस कार्यक्रम ने साहित्य, विज्ञान और अध्यात्म की त्रिवेणी को एक ही मंच पर संगमित कर दिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ वंदना सूर्यवंशी द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना एवं मधुर भजनों से हुआ, जिससे समूचा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत हो उठा। प्रथम चरण में परिचय एवं व्याख्यान सत्र आयोजित हुआ, जिसमें वक्ताओं ने जीवन मूल्यों, धर्म, साहित्य और समाज के अंतर्संबंधों पर अपने गहन विचार व्यक्त किए।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में आचार्य धर्मेन्द्र ने कहा कि “विज्ञान अकेला विनाश का कारण बन सकता है, जबकि केवल अध्यात्म अंधविश्वास को जन्म दे सकता है। विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय से ही सर्वोदय समाज की स्थापना संभव है।” उन्होंने यह भी कहा कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, प्रत्येक युद्ध का अंत समझौते से ही होता है। आज विश्व के सामने यह प्रश्न है कि वह सृजन का मार्ग चुनता है या विनाश का।
इस अवसर पर उमाकांत तिवारी, शिवनाथ सिंह ‘शिव’, जे.पी. सिंह, रमेश सिंह, सौदागर सिंह, प्रेमनाथ गुप्त तथा डॉ. शिवेश्वर दत्त पाण्डेय सहित अनेक विद्वानों ने अपने विचारों से श्रोताओं को ज्ञान, संवेदना और चिंतन की नई दिशा प्रदान की। उनके वक्तव्यों में जीवन की सार्थकता, साधना की आवश्यकता और साहित्य की सामाजिक भूमिका का सुंदर समन्वय देखने को मिला।
मंच संचालन नंदलाल मणि त्रिपाठी ‘पीताम्बर’ ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया, जिससे कार्यक्रम की गरिमा और भी बढ़ गई। आयोजक मंडल की ओर से दिनेश श्रीवास्तव ‘गोरखपुरी’, अभय श्रीवास्तव, राजेश कुमार द्विवेदी एवं शशि श्रीवास्तव ने सभी आगंतुकों का आत्मीय स्वागत कर आयोजन को स्नेह और सम्मान की ऊँचाई प्रदान की।
यह आयोजन एक आध्यात्मिक अनुष्ठान के रूप में स्थापित हुआ, जहाँ विचारों की गंभीरता, भावों की पवित्रता और शब्दों की साधना ने मिलकर एक दिव्य वातावरण का सृजन किया। निस्संदेह, ऐसे आयोजन गोरखपुर की सांस्कृतिक चेतना को नई दिशा और ऊँचाई प्रदान करते रहेंगे।



