
साँसों का सौदा, मौत सस्ती, कैसा यह व्यापार हुआ,
जीवन की कीमत गिर बैठी, मानव कितना लाचार हुआ।
मासूमों की कोमल धड़कन, पल में मौन कहानी थी,
माँ की सूनी गोद बता दे, कितनी गहरी हानि थी।
रोते-रोते थक गए आँगन, सूने पड़ गए खेल सभी,
एक हादसे ने छीन लिए, जीवन के मधुमय पल सभी।
सत्ता बोली, सत्ता रोई, शब्दों की बरसात हुई,
लेकिन पीड़ा की धरती पर, कब सच्ची सौगात हुई?
नकाब लगा चेहरों पर था, आँखों में अभिनय भारी,
दुख के अवसर पर भी सबने, साधी अपनी तैयारी।
श्रद्धांजलि के फूल चढ़े थे, मन में फिर भी स्वार्थ रहा,
कुर्सी की गणना में उलझा, मानवता का अर्थ रहा।
दोष किसी पर डाल सभी ने, अपने हाथ बचा डाले,
उत्तरदायित्वों के पथ से, कितने चेहरे कतराए।
सेवा वाले पावन पथ पर, यदि संवेदना हार गई,
फिर प्रगति की हर उपलब्धि भी, मानवता से हार गई।
आओ ऐसी शपथ उठाएँ, फिर न कोई घर रोए,
मासूमों की हर मुस्कान पर, संकट का बादल न होए।
जीवन सबसे बड़ा धर्म है, यह संदेश जगाना है,
दया, सत्य, उत्तरदायित्व से, भारत को महकाना है।
मौत कभी सस्ती न होगी, यदि मन में इंसान बचे,
करुणा, प्रेम और सत्य रहें, तभी धरा पर भगवान बचे।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार




