
चाँद-तारों का आँगन, सितारों का आँगन,
जवानों संग बुजुर्गों औ बच्चों का संयोग,
गुलज़ार करे चौबारा और गलियारा,
प्यार-मनुहार, सम्मान एवं संस्कारों का सौरभ,
गमकाए अंतस से बाहर तक, दिन रात उजाला।।
आज खो गया है कहीं ये ख़ूबसूरत नज़ारा।
ज़रूरत आन पड़ी,चलो इसको ले आएंँ,
बालकों संग बुजुर्गों का ताल मिलाएँ।
संयुक्त परिवार की चलाने को,
तालों से नदिया मिलाने को,
भावों की उत्ताल तरंगों संग,
सागर तक राह बनानी है।
अपनी भूलों को सुधारना है,
आगत को सँवारना होगा,
माध्यम हमें ही बनना होगा,
सितारों से आँगन सजाना होगा।।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।
27-06-26




