साहित्य

पूर्णिका

डॉ उषा

प्रेम का दिया जलाया तेरे इंतज़ार में।

मन मचल रहा है अब तो इसरार में।।

 

हर आहट पर दिल आज कुछ कहता है।

वह भी प्यार का करता अब इकरार है।।

 

रात ने ओढ़ी गम ए तन्हाई की अब चादर।

चॉंद को मेरा पता बता करता इजहार है।।

 

जलती हुई शम्आ से पूंछता परवाने को।

उसको बचाकर करता प्यार का एतबार है।।

 

झूठ सहारा लेकर कौन जिया करता है।

तनमन बहुत संभाला करता व्यापार है।।

 

तू मेरे पास रहे न रहे हैं तो अब तू उषा का।

इंतज़ार रहता मुझे आता होगा इश्तहार है।।

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण

छतरपुर मध्यप्रदेश

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