
ऐ बंदे आख़िर गुरूर किस बात का है,
धर्म का,नस्ल का या कि जात का है?
मिट्टी से बना है तू भी मेरी तरह,
फिर बता तू किस औक़ात का है?
भेष बदल के मग़रूर हो गया,
इंसान ही इंसान से दूर हो गया।
दो दिन का मेहमान ही है ये जीवन,
फिर ये कैसा गुरूर हो गया?
न रंग रहेगा, न ये नाम रहेगा,
न शान-ओ-शौकत का काम रहेगा।
जब ढह जाएगी ये क़स्र-ए-हस्ती,
सिर्फ़ मिट्टी का ही अंजाम रहेगा।
धर्म-मज़हब पे ही लड़ रहा इंसान,
बात-बात पे ही अड़ रहा इंसान।
नफ़रत की दीवारें गिरा दो न यारों,
ज़िंदानों में कितना सड़ रहा इंसान।
छोड़ दे घमंड, झुका ले नज़र,
यही है इबादत, यही है हुनर।
मुहब्बत से भर जाए ये दो जहाँ,
मेरी दुआओं में हो इतना असर।
आकिब जावेद
बांदा, उत्तर प्रदेश
मौलिक ,स्वरचित




