साहित्य

न घर का रहा न घाट का—हास्य-व्यंग्य

जयचन्द प्रजापति 'जय'

एक साहित्यिक संस्था के मेरे परिचित एडमिन जी हैं। बहुत उदार ह्रदय। करूणा का सागर छलकता है। जो उनसे मिल ले वह उनकी भावना पर हजारों बार न्योछावर हो जाता है। बिना दाग धब्बे के आदमी हैं।

उनकी उदारता के कारण उनकी संस्था में कई साहित्यकार उनका पैर धुलकर उसका अमृत पान करते है। उस संस्था में कोई साहित्यकार गलती उनके बनाये नियम से कर दे तो उनके तलवे चाटने वाले गिध्द की तरह दूरदृष्टि रखने वाले उस साहित्यकार का मांस नोच-नोच कर खा जाने की हिम्मत रखते हैं।

भाई साहब गलती से एक बार हमने नियम के विपरीत कविता लिख दी। एडमिन साहब की आंखों से लाल-लाल खून टपकने लगा। एडमिन साहब के हितैषी साहित्यकार मरहम-पट्टी लेकर नंगे पांव दौड़े। एडमिन साहब के रक्ताश्रु को पोंछते हुये हाल समाचार जाना।

उसके बाद सारे अमृतपान करने वाले गिध्द की तरह मुझे लगे नोंचने। किसी ने मेरे गाल नोंचे। किसी ने मेरी आंखों में चोंच मारा। एक ने तो मेरा एक कान ही लेकर भागा। तरह-तरह के खुरापात किये। बड़े-बड़े खुरापाती साहित्यकार है। मैं डरकर भागा। जान हथेली पर रखकर भागा।

मैं नौ दो ग्यारह हो गया लेकिन भाई साहब होनी को कौन टाल सकता है। मेरी पूंछ भागते वक्त अटक गयी। एडमिन साहब पूंछ पकड़ कर लटक गये। इतने में सम्पूर्ण माननीय एडमिन साहब के प्राण पखेरू कहे जाने वाले सब पकड़ कर लटक गये। आखिर मेरी पूंछ ही उखाड़ कर सबने एडमिन साहब के चरणों में अर्पित कर दिया।

मैं हजारो किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से भागा। सिर पर पैर रखकर भागा। जान बच गयी लेकिन भाई साहब मैं सांस का मरीज हो गया। ईश्वर की कृपा से सांस चल रही है। एडमिन साहब का प्रकोप लई डूबा मेरा साहित्यिक कैरियर। अब मैं अशक्त हो गया है। अब न घर का रहा न घाट का।

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जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

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