
प्रभात की पहली किरण जब
रंग बिरंगे फूलों को छूती है,
तब प्रेम मौन प्रार्थना बनकर
हृदय की देहरी पर उतरती है।
जहाँ बैर की जगह करुणा भाव बढ़े
और स्मृतियों से कटुता मिट जाए,
वहाँ प्रेम का कोमल स्पर्श
मनुष्यता को फिर से गढ़ जाए।
प्रेम ही वह दीप है
जो धीरे-धीरे धैर्य से जलता है,
और सदाचार की राहों पर
जीवन के उजास में ढलता है।
जहाँ शत्रुता का बैर भाव मिटे,
और मित्रता का विस्तार हो,
नये निर्माण के नव स्वप्नों से
सजता हर दिन, हर विचार हो।
प्रेम जब प्रतिज्ञा बन जाए,
और पाप से मन दूर रहे,
तब पशु-पक्षी, वृक्ष, नदियाँ
प्रकृति अपनी सी लगने लगे।
जीवन का अधिकार समान हो,
जब यह भाव सबके हृदय में बसे,
तो व्यवहार में सादगी ,सहजता से
दुनिया की नज़रों में सम्मान बढ़े।
जब रिश्तों के मूल में प्रेम हो,
तब समाज सुखमय बन जाता है,
और विश्व-शांति के संदेश से
भोर-पुष्प सा खिल जाता है।
सुमन बिष्ट, नोएडा




