
यह दुनिया का मेला है और
इस मेले में हम अकेले भी हैं
और शायद अकेले नहीं भी हैं,
दुनिया में झमेले ही झमेले हैं।
कोई महाराज राजाधिराज है,
और कोई महामंडलेश्वर है,
तो कोई ईश्वर का पुजारी है,
और कोई स्वयं ही ईश्वर है।
सौ सौ चूहे खाकर बिल्ली
हज को चली तो ठीक है,
यहाँ तो हज़ारों लाखों को
पूरा खाकर पाक साफ़ हैं।
दामन में कितने ही दाग हों,
जब एक दल से दूसरे दल में,
जाते हैं, सब दाग धुल जाते हैं,
वो संगम में स्नान कर आते हैं।
महाकुम्भ का शुभ मुहूर्त 144 वर्ष
में ग्रहों के शुभ संयोग से आता है,
लेकिन राजनीति का गृह हर साल
शुभ मुहूर्त का महाकुम्भ ले आता है।
आदित्य राजनीति की बैतरिणी
राजनेताओं का उद्धार करती है,
जो प्राय: सत्ता स्वर्ग तक आसानी
से सुख भोगने के लिये पहुंचाती है।
- प्रभु का अब तो दीदार हो जाये
श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा
के दो वर्ष अब पूरे हो गये हैं,
चलो अयोध्या नगरी जहाँ वो हैं
प्रभू का अब तो दीदार हो जाये।
दर्शन को तरस गये हैं ये नैना,
हे प्रभु, मुझको भी दर्शन दो ना,
हम सब मिल देखने मंदिर जायें
आओ ना प्रभू दीदार हो जायें।
पाँच शताब्दी बाद बन पाया है,
फिर से श्री राम लला पधारे हैं,
जन्मभूमि पावन श्री रामचंद्र की,
दर्शन को मेरे नैना तरस गये हैं।
भारत का मान सम्मान बढ़ा है,
144 वर्ष के बाद मुहूर्त आया,
महाकुम्भ में ग्रहों के मिलन का
सौभाग्य से शुभ संयोग हुआ है।
आदित्य छवि श्री राम लला की,
बसी है मेरे मन दशरथ नन्दन की,
माँ कौशल्या की लोरी सुन सुन कर,
बोलो जय सिया राम चन्द्र जी की।
विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ




