साहित्य

चुनाव की दारू…?

बेख़ौफ़ शायर डा.नरेश सागर

दारू के पब्बे को पीकर, वोट डालने निकले हैं
घटिया वाली देख के दारू, कुछ बेबडे फिसले है
दारू……….

बस एक दो हफ्ते ही ,खुलकर चांदी काटेंगे
रोज करेंगे वादा सबसे ,और रोज ही नाटेगे
अपनी करनी के जाल में,उलझे हुए निकले हैं
दारू……..

बच्चों की शिक्षा की चिंता ,कोई नहीं अब कोई नहीं
दारू के पब्बे के आगे , भला बुरा अब कोई नहीं
देखके दारू कैसे – कैसे, ज्ञानी रस्ता बदले हैं
दारू………..

काम कोई कैसे होगा , किस मुंह से करवाओगे
लाखों रूपये मांग -मांग कर, जब पहले पी जाओगे
नये जमाने में भी देखो , विचार ये कितने गंदले है
दारू………..

कच्ची सड़कों पर कीचड़, पीकर ये ही फिसलेंगे
घर से छोटे- छोटे बच्चे, कैसे कीचड़ से निकलेंगे
आएंगे मेहमान ना सोचा, अक्ल से सारे टकले है
दारू…….

गांव की खुशहाली से इनका, कोई नहीं लेना देना
जिधर भी पीने को मिल जाए, बस उधर ही रहना
‘सागर’ थोड़े से लालच में, ये दीवाने फिसले है
दारू के पब्बे को पीकर , वोट डालने निकले हैं।।
………
बेख़ौफ़ शायर डा.नरेश सागर
गोल्डन बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज
Email.. nsnareshsagar1@gmail.com

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