साहित्य

कपड़े(लघुकथा)

अभिलाषा श्रीवास्तव

कपड़े(लघुकथा)

“मृत व्यक्ति के कपड़े नहीं रखा जाता व एक हमारी बहू है
जो इस दुनियाँ की है ही नहीं ”
सीधे तौर पे नहीं लेकिन अम्मा ने कहा व शिवराज सिंह ने पत्नी को आंखें तरेरते हुए कहा
“जहाँ से लाई हो वहीं रख आव”
मीना ने कहा तो कुछ नहीं लेकिन आंखों के कोर से छलके पानी ने सहमति दर्ज कराई मन में पिता के लिए अथाह प्रेम व ससुराल में पिता के कपड़ों पे चल रहा कलह मीना को पीड़ा दे रहा था जीवन के चक्रव्युह में बैठीं सोच रहीं थी मीना
‘ यह वही कपड़े है जिसे पहनकर पापा जीवित में आये थे’
व संयोग से छुट गया तो मीना उसे अलमारी में रखीं ताकी वह पिता को भेज सकें लेकिन कपड़े तो नहीं भेज पाई व पिता का देहांत हो गया चार दिन का ट्रेन का सफ़र तय कर के वह पिहर आंगन में पहुचीं तो सही लेकिन पिता का दर्शन नहीं हुआ
अंतिम संस्कार के उपरांत वह वापस आ तो गई लेकिन मन के किसी कोने में पिता जीवित थे अत:जब भी मन भारी होता वह उस कपड़े से लिपट के रो लेतीं एक दिन सासु मां ने देख लिया फिर क्या था घर में कपड़े को लेकर अपशगुन के अनगिनत बातें दोहराया गया व मीना को खुब खरी खोटी सुनायीं सासु माँ ने
‘क्या सच में पिता के कपड़े अपशगुन करते हैं तो वह गहने व महंगे दामों के वस्तु क्यों नहीं करते जो पिता के जीवन भर के जमापूंजी से बेटी के विवाह में दिया गया था’
मीना ने सोचा बोल दे लेकिन मौन रह गई व शिवराज सिंह के आदेश पे कपड़ा को डाक सेवा द्वारा भेजने को तैयार भी थी लेकिन मन के मोह ने कहा
‘मीना तुम भी तो उसी मृत पिता का अंश हो क्या- क्या भेजो गी बोलों तुम व तुम्हारी सासु माँ’
मीना का मन सोचते हुए प्रश्नों में उलझा शिवराज सिंह के पास पहुचीं व बोलीं
“यह कपड़ा मेरे जीवित पिता के है व यह मेरे लिए एक धरोहर है अगर मृत लोगों के द्वारा नुकसान होता तो कोई भी अपने घर में महात्मा गॉंधी, चन्द्र शेखर आजाद या विवेकानंद का फोटो नहीं रखता ‘
आंखों से बहती हुई आंसुओं को रोकते हुए मीना ने आगे कहा
” मेरे पापा कोई महापुरुष या युगपुरुष नहीं थे लेकिन वह मेरे जनक थे और मैं अपने मृत्यु तक यह कपड़ा संभाल कर रखुगी जिसे जो कहना है वह कहता
रहे ”
कहते हुये मीना दुसरे कमरे में चलीं जाती है लेकिन उसका पिता के प्रति मोह शिवराज सिंह को सोचने पे मजबूर कर देता है कि एक बेटी अपने पिता के कपडों के लिए बगावत कर सकतीं है व एक हम हैं जो साथ रहकर भी जीवित पिता को वक़्त भी नहीं दे पाते।
अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर

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