
गर्मियों के दिन थे। ज़ब मैं छोटी थी तब मेरे राम जी चाचाजी ने अपने बग़ीचे के एक टोकरी आम भेजे। आम बहुत मीठे थे। हम सभी भाई-बहन को आम बहुत अच्छे लगे। हम सभी बहनो ने सोचा—ऐसे ही आम में अपने छत पर गमले में लगायेगे ।
हम सभी गमलें में एक जगह थोड़ी मिट्टी खोदी। वहाँ आम की एक गुठली डाल दी। गुठली पर मिट्टी डालकर उसमें थोड़ा पानी छिड़क दिया। हम सभी-मिलकर वहाँ प्रतिदिन सुबह वहाँ पानी डालते । स्कूल से आने के बाद धूप में ही छत पर उत्साह पूर्वक चले जाते थे,मन में यह विचार लिये कि अरे आम का पेड़ कितना बड़ा हुआ होगा ।कुछ दिन बीत गए। आम का पौधा नहीं निकला। हम सभी भाई -बहन ने पानी डालना बंद कर दिया।
एक दिन हलकी-हलकी वर्षा हो रही थी। भाई घूमता हुआ छत पर गमले की जगह पर जा पहुँचा। सामने ही लाल-लाल कोंपलों वाला नन्हा-सा पौधा लगा था। पौधा देखते ही भाई प्रसन्न हो उठा। “पौधा निकल आया, पौधा निकल आया,” कहते-कहते वह अंदर भागा। अपनी छोटी बहन पूजा का हाथ पकड़कर उसे बग़ीचे में ले आया। पौधा देखकर पूजा भी ख़ुशी से उछल पड़ी।
हम सभी जोर से बोले , “यह पौधा मैंने लगाया है। यह आम का पौधा है। इसमें ख़ूब मीठे आम लगेंगे।” सब भागे-भागे दादी जी के पास गए। दादी जी बोली , “क्या बात है? आज तुम लोग बहुत प्रसन्न हो।” मैं बोली , “दादी जी , बग़ीचे में आम का पौधा निकल आया है। अगले वर्ष हम अपने ही पौधे के आम खाएँगे।” उसकी बात सुनकर दादी जी हँस पड़ी । वे प्यार से बोली , “छोटे से पौधे को बड़ा होने में बहुत समय लगेगा। चार-पाँच वर्ष में यह एक बड़ा पेड़ बन जाएगा। इसका तना मोटा होगा। बड़ी-बड़ी शाखाएँ होंगी। तब इसमें आम लगेंगे।
यह सुनकर हम भाई- बहन थोड़ी उदास हो गए । पर पूजा तुरंत बोली , “कोई बात नहीं। हम पौधे की देखभाल करेंगे। एक दिन हम इसके फल अवश्य खाएँगे।”
कि आज का किया अच्छा काम कल मीठा फल देता है। प्रकृति की रक्षा एवं शुद्ध वायु के लिए हमें ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने चाहिए।
“किसी भी महान कार्य या सफलता के लिए धैर्य और निरंतर मेहनत की आवश्यकता होती है। जिस तरह एक बीज को वृक्ष बनने में समय लगता है, उसी तरह हमारे सपनों को पूरा होने में भी समय लगता है; बस हमें विश्वास के साथ उनकी देखभाल जारी रखनी चाहिए।”
कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)
स्वरचित रचना




