साहित्य

नमन

अवधेश कुमार श्रीवास्तव

उधार मिला जीवन प्रभु से,इसे नष्ट नहीं होने देना,
जितनी सांसें हैं मिलीं वहां से,सबको खुशी से जी लेना,
कुछ भी अलग से न चहिए मुझको,तू पहले से ही करें यथा
मुझे भेजा आदेश के पालन हित,उसपर ही मुझे ध्यान है देना।।

सर्वेश्वर तू भाग्य विधाता,रक्षक व संहारक सब,
जब जो उचित समझेगा प्रभू,होगा वह फलदायक सब,
हम तो निमित्त मात्र प्रतिनिधि हैं करवाता जो करते उसको
बुद्धि कुबुद्धि न जानूं कुछ मैं,होता वही जो चाहे रब।।

जीवन जीना कला है प्यारे,सब अपने मन से हैं जीते,
बनता मन संगत के संग, अनुसरण से हम वैसे हैं जीते
कुबुद्धि सदा उत्तेजित होली,भले बुरे का ध्यान न करती
चलती अंटशंट ढंग से यह,जब ज्ञान चक्षु होते हैं रीते।।

प्रभु प्रसाद में मिला यह जीवन,जिसकी रट हैं देव लगाए,
वो नहीं योग्य शायद हमसे,तभी तो प्रभु जी हमें पठाए,
आखिर कुछ तो उत्तम मानव में जिससे प्रभु सदा प्रसन्न रहें,
हो जाए समय जब पूर्ण हाट का,बिन विलंब वह पास बुलाए

अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर

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