
झूमता आया फागुन की मस्ती
बहारों की रानी की है ये बस्ती
पूरवाई ने ली है आज अंगड़ाई
महुवा फूल जंगल को महकाई
फाग की राग गुँज रहा चहुँओर
गली गली में घूम रहा चित्तचोर
गाँव की गौरी पे डालना है डोर
ये मदमस्त है फागुन की भोर
ढोल नगाड़े झांझर का ये शोर
गोरी की तन रंग में डूबा पोर पोर
श्याम श्वेत भी लगता अब गोर
फागुन के काँधे पे मस्ती का दाैर
रंग विरंगे खिला पलाश के फूल
गुलाब बैठा है बिछा कर शूल
बेला चमेली डाली पे खिल आई
गाँव गाँव फाग की मस्ती है छाई
कितना सुन्दर सपन सलौना
मांदर की ताल पे झूम रहा सगीना
छुप छुप कर ‘रंग खेले है हँसीना
भंग की नशे में आज है यहाँ जीना
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार




