साहित्य

नारी: एक अनकही इबारत

पूर्णिमा सुमन

जब-जब तुम्हारी कहानियाँ लिखी जाएंगी,

स्याही में समर्पण और पन्नों पर साहस उतरेगा।

तुम महज़ एक नाम नहीं, पूरा का पूरा विस्तार हो,

कभी बहती नदी, तो कभी थमा हुआ मझधार हो।

तुमने अपने आंसुओं से सींचा है रिश्तों का उपवन,

तुम्हारे मौन में छुपा है, युगों-युगों का चिंतन।

जब दुनिया ने तुम्हें घेरों में बांधना चाहा,

तुमने हर चौखट को लांघकर नया आसमान रचा।

ममता की लोरी हो तुम, और रण की हुंकार भी,

तुम कोमल कली हो, और वक़्त की तलवार भी।

इतिहास के हर पन्ने पर तुम्हारा ही नूर होगा,

तुम्हारे बिना तो हर किस्सा, हर शब्द अधूरा होगा।

जब-जब लिखी जाएगी इस जहां की दास्तान,

तुम ही कहलाओगी उसका सबसे खूबसूरत शीर्षक और सम्मान।

पूर्णिमा सुमन
झारखंड धनबाद

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