आलेख

उल्टी गिनती

अरुण दिव्यांश

मनुष्य को हर प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है , क्योंकि मानव सबसे अधिक समझदार प्राणी है ।
मनुष्य जन्म लेता है और पाॅंच वर्षों तक अंजान बना रहता है , किंतु हमें तो लगता है कि मानव पाॅंच वर्षों के बाद आजीवन ही नादान बना रहता है । मानव अच्छी से भी अच्छी शिक्षा अवश्य प्राप्त कर लेता है , जिसे सुशिक्षित या सुयोग्य कहा जाता है । यहाॅं तक कि मनुष्य बड़े से बड़े पदों पर पदासीन हो जाता है या विधायक , सांसद , मंत्री बन जाता है , मानव आजीवन नर्सरी कक्षा के गिनती , पहाड़ा और बारह खड़ी में ही उलझकर रह जाता है । जीवन के लिए पढाई और जीवन की पढाई में जमीन आसमान का अंतर हो जाता है ।
जीवन की पढ़ाई सच पूछा जाए तो मानव के किशोरावस्था से आरंभ होता है , जिसमें सीधी गिनती , पहाड़ा और बारह खड़ी सीखता है और युवावस्था में सदैव उसका उपयोग और उपभोग तबतक करता है जबतक कि उसकी बहू न आ जाए या उसके कोई बेटे बेटी न आ जाऍं , क्योंकि यही वह अवस्था होती है जहाॅं से मानव उल्टी गिनती सीखना आरंभ करता है और यह उल्टी गिनती जब आरंभ हो जाती है तो जीवन का अंत करके ही दम लेती है । मानव जबतक इस अवस्था में उल्टी गिनती जबतक होशोहवास रहता है तबतक सीखता रहता है , क्योंकि इसके पूर्व दूसरों को सीखाया है जबकि अब स्वयं बेटे और बहू से सीखना पड़ता है , कि हमें क्या उत्तर देना है या उत्तर देना भी है या नहीं , इस विषय में भी सोचना पड़ जाता है और अंततोगत्वा जब मानव गिर जाता है और उठने के लायक भी नहीं रहता । यह अवस्था जीवन की अंतिम घड़ी है , जब मानव बेहोश ही नहीं हो जाता , बल्कि होशोहवास में जो उल्टी गिनती सीख रहा था , वह अब उर्ध्व साॅंस अर्थात् उल्टी साॅंस में बदल जाता है और धीरे धीरे अंत में आत्मा तन को तज देता है ।
इस प्रकार मानव जीवन को शान व शौकत से जीने के लिए अथक परिश्रम करके एम ए , पी एच डी , आदि जैसे उच्च शिक्षा प्राप्त कर उच्च पद को प्राप्त कर लेता है , जबकि जीवन की शिक्षा नर्सरी से आगे नहीं बढ़ पाता और अंत में उल्टी गिनती सीखते सीखते जीवन का ही अंत हो जाता है । ऐसी अवस्था यह समझ में नहीं आ रहा होता है कि वास्तव में उल्टी गिनती हम सीख रहे होते हैं या उल्टी गिनती हमारे बेटे बहू पढ़ रहे होते हैं । हालांकि दोनों बात एक ही है , बेटे बहू जब पढ़ते हैं तभी तो हम सीखते हैं ।
किंतु जीवन की पढ़ाई ऐसी होती है कि हम नर्सरी में ही पढ़ते पढ़ते नर्सरी की परीक्षा भी नहीं दे पाते कि जीवन का अंत हो जाता है ।

अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!