
विश्व जल दिवस पर विशेष कविता

विश्व जल दिवस का संदेश, सुनो धरती के वीर,
जल ही जीवन का आधार, यही सृष्टि का नीर।
२२ मार्च का ये दिन, चेतावनी का स्वर,
संभल जाओ मानव, मत करो प्रकृति पर प्रहर।।
बूँद-बूँद में बसता है, जीवन का संगीत,
सूख गया जो जल कभी, सूख जाएगी प्रीत।
नदियाँ, सरोवर, सागर सब, देते जीवन दान,
इनके बिना अधूरा है, मानव का सम्मान।।
धरती की छाती फट रही, सूखे की है मार,
प्यासे होंठों की पीड़ा, करती हाहाकार।
मटकी लेकर चलती माँ, मीलों लंबी राह।
एक बूँद की आस में, थम जाती हर चाह।।
कारखानों का काला ज़हर, नदियों में बहता,
निर्मल गंगा-यमुना भी, आज विष सा लगता।
मछलियाँ तड़प-तड़प कर, देती हैं ये पुकार,
“मानव! क्यों करता तू, अपने ही घर पर वार?”
मिट्टी में घुलता ज़हर, पानी में बीमारी,
पीते ही बढ़ जाती है, जीवन में लाचारी।
निर्मल जल की चाह में, तरस रहा इंसान,
कब समझेगा ये जग, जल ही है भगवान।।
नल खुला छोड़ देता, सोचता नहीं ज़रा,
हर बूँद में बसता है, जीवन का ही धरा।
जो आज यूँ ही बहा दिया, कल रोएगा वही,
सूखे अधरों से पूछो, कीमत क्या है सही।।
आओ मिलकर व्रत लें हम, जल को सहेजेंगे,
वर्षा की हर बूँद को, जीवन में ले लेंगे।
पेड़ लगाएँ, जल बचाएँ, ये ही सच्चा धर्म,
प्रकृति के आंचल में ही, छिपा हुआ है मर्म।।
हाथों में है भाग्य हमारा, सोचो और समझो,
जल के बिना भविष्य नहीं, इस सत्य को परखो।
जल है तो कल है, यही पुकार है आज,
इसे बचाना ही मानव का, सबसे बड़ा है काज।।
*स्वरचित मौलिक*
*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*




