
मिट्टी से जीवन गढ़ते हैं,
पसीने से सपने सींचते हैं,
ये श्रम के सच्चे पुजारी,
हर दिन नया इतिहास लिखते हैं।
धूप की तपिश में जलते हैं,
सर्द हवाओं में ठिठुरते हैं,
फिर भी चेहरे पर मुस्कान लिए,
अपने कर्मपथ पर बढ़ते हैं।
हाथों में छाले, आँखों में चमक,
मन में अटूट विश्वास लिए,
ये धरती के सच्चे रक्षक,
जीवन को आकार दिए।
ईंटों में घरों का सपना,
खेतों में हरियाली बोते,
अपने श्रम की हर एक बूंद से,
दुनिया को समृद्ध करते।
न कोई शिकवा, न कोई गिला,
बस कर्म ही इनका धर्म है,
संघर्षों से गढ़ी हुई कहानी,
इनका जीवन ही एक मर्म है।
नमन है उन श्रमिक हाथों को,
जो सृजन का आधार बने,
इनके श्रम की महिमा से ही,
हम सबके जीवन साकार बने।
डॉ अपराजिता शर्मा
रायपुर




