
मुफ़्त की श्रमिक नहीं,
जीवन की अनकही धड़कन है वह,
जो सूरज से पहले उठती है,
और अंधेरे के बाद भी बुझती नहीं।
वह सिर्फ़ एक स्त्री नहीं,
वह हर उस हाथ की थकान है,
जो रोटी सेंकते-सेंकते,
खुद आग में तप जाती है।
घर के कोनों में बसी उसकी खामोशी,
और सड़कों पर चलता मज़दूर है,
दोनों की कहानी एक ही है,
बस रूप अलग, संघर्ष एक है।
वह धीमी आँच सी जलती है,
और वह धूप में पसीना बहाता है,
दोनों ही जीवन के चूल्हे पर,
अपनी किस्मत को पकाते हैं।
एक की थाली ठंडी रह जाती,
दूजा फुटपाथ पर सो जाता है,
पर दोनों के सपनों में,
रोटी की गर्माहट ही घर बनाती है।
कभी “फर्ज़” कहकर दबा दी जाती,
कभी “मज़दूरी” कहकर ठुकराई जाती,
पर श्रम की ये दो परछाइयाँ,
समाज की असली नींव बन जाती।
न शिक्षा का ताज उनके सिर,
न सम्मान के बड़े शब्द,
फिर भी इनके कर्मों से ही,
चलता है जीवन का हर रथ।
वह माँ, बहन, बेटी बनकर,
हर रिश्ते को सींचती जाती,
और वह मजदूर बनकर,
हर शहर को आकार दिलाता।
दोनों ही धरती की संतान हैं,
एक घर में, एक बाहर,
पर दोनों की आत्मा में
बसता है संघर्ष अपार।
ऋतुएँ बदलें या हालात,
उनकी मेहनत नहीं रुकती,
थकान शब्द भले न हो जीवन में,
पर पीड़ा हर दिन चुपचाप सहती।
फिर भी आशा की लौ जलती,
उनकी उनींदी आँखों में कहीं,
कि एक दिन पहचान मिलेगी,
उनके अस्तित्व को भी यहीं।
क्योंकि सच तो यही है,
हम सब मजदूर हैं अपने-अपने स्तर पर,
पर कुछ की मेहनत दिखती नहीं,
और कुछ की गिनती होती कमतर।
अब समय है समझने का,
कि श्रम कोई दासता नहीं,
यह सृजन का सबसे पवित्र रूप है,
और इसका कोई विकल्प नहीं।
उठो, पहचानो उन हाथों को,
जो दुनिया को आकार देते हैं,
क्योंकि वही हाथ एक दिन,
अपनी किस्मत भी लिखते हैं।
स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति
सुमन बिष्ट, नोएडा




