
जीवन के खाली पन्नों पर,
लिखी थी मैंने एक कहानी।
कुछ पन्ने रह गए थे अधूरे,
कुछ यादें हो गई पुरानी।
समय का पहिया घूमता रहा,
मैं तस्वीरों में रंग भरती रही।
सपने आसमान छूने लगे थे,
और मैं ख्वाबों में जीती रही।
फिर जिंदगी में एक मोड़ आया,
सब कुछ टूट कर गया बिखर।
टूटे हुए सपनों को समेटा मैंने,
सोचा क्यों न पा सके अपना शिखर?
टूटे सपनों की अधूरी कहानी,
शायद ही कभी पूरी हो पाएगी।
पर अधूरेपन में भी अलग मजा है,
ये सोचकर जिंदगी संभल जाएगी।
आज भी जब यादों की कब्रगाह में,
दफन हुए सपनों को देखती हूं।
एक दिन उठेंगे और फिर मुस्कुराएंगे,
हर पल बस ये सोचती हूं।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।




