
मैं अध्यापक बन जाऊँ तो,अज्ञान तम को चीर चलूँ,
हर नन्हे मन की ज्वाला बन,ज्ञान-अग्नि मैं धीर जलूँ।
टूटी हिम्मत को जोड़ूँ मैं,हर डर को ललकारूँगा,
जो झुकने लगे हालातों से,उसे फिर से संवारूँगा!
नहीं पढ़ाई बोझ बनेगी,ये संकल्प उठाऊँगा,
खेल-खेल में, हँसते-गाते,ज्ञान-सुधा बरसाऊँगा।
नई नीति की नई दिशा में,हर कदम बढ़ाऊँगा,
जीवन जीने की कला सिखा,उज्ज्वल पथ दिखलाऊँगा।
संस्कारों की जड़ गहरी हो,ऐसा बीज बोऊँगा,
हर बालक में छिपे वीर को,जागृत मैं कर जाऊँगा।
जो गिर जाए, उसे उठाकर,फिर रण में भेजूँगा,
हार नहीं है अंत किसी का,ये सत्य उसे सिखलाऊँगा।
मैं अध्यापक बन जाऊँ तो,बस इतना उपकार करूँ,
हर बच्चे के भीतर छिपे सूरज को साकार करूँ।
#मैं अध्यापक बन जाऊँ तो,अज्ञान तम को चीर चलूँ,
हर नन्हे मन की ज्वाला बन,ज्ञान-अग्नि मैं धीर जलूँ।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




