
चलो जमीन में एक बीज बोते हैं,
उसके बड़ा होने के सपने संजोते हैं।
जब बीज एक बड़ा पेड़ बन जाएगा,
फल फूल छाया ऑक्सीजन देगा।
पंछी करेंगे उस पर अपना बसेरा,
खुशियों भरा होगा फिर हर सवेरा।
पेड़ के नीचे पथिक को मिलेगी छांव,
कुछ पल आराम कर लेंगे थके पांव।
हर मौसम की मार चुपचाप सहता,
अपने अंदर वर्षा जल संचित करता।
लकड़ी से बनती है वस्तुएं अनगिनत,
हरे भरे वृक्ष होते हैं वसुंधरा की चाहत।
एक पेड़ धरती मां के नाम लगाएं,
वसुंधरा को वृक्षों के गहनों से सजाएं।
धरती के है हम पर बहुत उपकार,
वृक्ष लगाकर जताएं हम अपना प्यार।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।




