
नभ मंडल में घन मगन, सजा रहे बारात।
कलश नीर ढरका रहे, आयी है बरसात॥
रिमझिम बूँदों की लड़ी, पड़ती है जब गात।
मन मयूर है नाचता, बन जाती है बात॥
इंद्रधनुष शोभे सुखद, अम्बर मध्य विभोर।
नित्य हवा बरसात में, करती अद्भुत शोर॥
तड़ित चपल चमके चतुर, विरहिन कहे पुकार।
कब आओगे साजना, तड़पे जिया अपार॥
दादुर नर्तन कर रहा, झींगुर ठोके ताल।
ठुमक-ठुमक सब गा रहे, बदल गई है चाल॥
हलधर अधरों पर दिखे, मोहक-सी मुस्कान।
बारिश लाई है खुशी, खेती अब आसान॥
बाग बगीचे खिल गये, डाली खिला गुलाब।
गुंजन डोले नित्य अब, जिसका नहीं जवाब॥
डॉ॰ अर्जुन गुप्त ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




