साहित्य

ग़ज़ल

डॉ ऋतु अग्रवाल

कटे आगोश में उसके वही शब चाँदनी देना

नहीं तो बस अमावस की मुझे तुम ज़िंदगी देना//

 

दिखाया इश्क़ का मंज़र तुम्हारा शुक्रिया रब्बा

तुम्हारे बाद अब मुझको उसी की बंदगी देना//

 

सदा रोशन रहे दुनिया सजे मुस्कान हर लब पर

दुखों की बस किसी को भी नहीं तुम तीरगी देना//

 

दुआओं में उठे हर हाथ की उम्मीद पूरी हो

ख़ुदा अपनी नवाज़िश से बशर हर को खुशी देना//

 

बहारों की रखो चाहत मगर पतझड़ भी आएगा

हवा ठंडी हो या तूफ़ान इक सी बानगी देना//

 

किसी के दर्द से इक हूक मेरे दिल में उठ जाए

ख़ुदा मेरे यही बस एक ख़ूबी आप सी देना//

 

बदन दो हैं भले अपने मगर इक रूह पाई है

उन्हीं से ज़िंदगी मुझको उन्हीं संग मौत भी देना//

 

स्वरचित ✍️ ✍️

डॉ ऋतु अग्रवाल

मेरठ, उत्तर प्रदेश

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