
सपने में आए थे।
हम लोगों को देखकर,
बहुत पछताए थे।
हमारे परवरिश में क्या,
कमी थी जो इतने दूर हो।
भाई होकर भी बातचीत,
करने से मजबूर हो।
एकता की नसीहत,
तुमने भुला दिया है।
रिश्तो की अहमियत,
तुमने भुला दिया है।
सप्ताह में एक बार,
बात कर लिया करो।
दुख-सुख ,खुशी-गम,
बाँट लिया करो।
हम मर कर भी साथ हैं,
तुम जीते जी जुदा हो गए।
इंसान भी ना बन सके,
तुम कब खुदा हो गए।
खुद ना सही बच्चों,
को तो मिला दो।
एकता का भाव,
उनमें तो खिला दो।
तुम्हारे बाद वो बहुत,
अकेले पड़ जाएँगें।
फूल खिलने से,
पहले ही झड़ जाएंगे।
मरने के बाद भी,
आत्मा भटक रही है।
तुम्हारे मुरझाते रिश्तो,
में अटक रही है।
अभी भी वक्त है मुरझाते,
रिश्तो में खाद दे दो।
थोड़ा सा झुक कर,
उसे प्यार का स्वाद दे दो।
बच्चों को हँसता देख,
हम मुक्त हो जाएंगें।
मोक्ष को पाकर,
उन्मुक्त हो जाएंगे।
संगीता वर्मा
कानपुर उत्तर प्रदेश



