
क्यों ना तुझसे अब किनारा कर लिया जाए ,
तनहा खुदको अब दुबारा कर लिया जाए,
तेरा मिलना तो ना मुमकिन सा लगता हैं,
क्यों ना तेरी यादों से गुज़रा कर लिया जाए।।
क्यों ना तुझसे अब किनारा कर लिया,
शायद थम जाऊं में अब ,
पर ये दिल का अब मुझे सहारा नहीं ,
शायद रूक जाऊं में अब ,
पर अब मेरा कोई गुजारा नहीं।।
तड़प जाएंगी ये आँखें तुझे पढ़ने को ,
तड़प जाएंगी ये आँखें तुझे पढ़ने को ,
पर शायद तू बुक का फटा काग़ज़ है,
अब पढ़ नहीं सकती तुझे ।।
– रिया राणावत
कालीदेवी,झाबुआ(मध्यप्रदेश)



