
रायबरेली के वरिष्ठ रचनाकार श्री रविशंकर शुक्ल जी की कविताओं से गुजरते हुए लगता है कि हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिल रहे हैं जो भीतर से बहुत संवेदनशील है, बाहर से बहुत निर्भीक है, और ज़मीन से पूरी तरह जुड़ा हुआ है। उनकी रचनाएं शब्दों का खेल नहीं, जीते-जागते अनुभवों का दस्तावेज़ हैं।
रविशंकर शुक्ल जी संवेदनशील और करुण हृदय वाले कवि हैँ। “खेल” और “शाश्वत सत्य” जैसी कविताएं बताती हैं कि शुक्ल जी के लिए कविता तकनीक नहीं, संवेदना है। “संवेदना जब द्रवित होती है तो वही लेखनी का प्रवाह बनती है”। वे उस पीड़ा को सबसे पहले महसूस करते हैं जो आम आदमी झेल रहा है। “हरखू” का पलायन, “कालिंदी कूल” की याद, “दुनिया का गम पीता हूँ” सब में एक गहरी करुणा है। वे रोते नहीं, पर रुला देते हैं। उनका दिल शीशे की तरह साफ है, इसलिए चोट भी जल्दी लगती है और दवा भी वही बनते हैं।
शुक्ल जी निडर और पाखंड-विरोधी स्वर वाले कवि हैँ। “कबीर” और “कलियुग का खेल” में शुक्ल जी कबीर के वारिस लगते हैं। “पाखंड के मर्म पर चोट करने वाला वीर”। उन्हें सच कहने से डर नहीं लगता। चाहे राजनीति हो, धर्म हो या समाज। जहाँ ढोंग दिखा, वहीं कलम चल गई। _”सब पैसे का खेल है भैय्या” कहकर वे आज के समय की सबसे कड़वी सच्चाई को दो पंक्तियों में उतार देते हैं। उनमें शिकायत नहीं, प्रतिरोध है।
रविशंकर शुक्ल जी मानवीय मूल्यों और सौहार्द के पक्षधर* कवि हैँ। “हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई / आपस में सब भाई”। इस एक पंक्ति में उनका पूरा समाज-दर्शन समाया है। वे नफरत के दौर में मोहब्बत की वकालत करते हैं। “आओ सुबहों शाम लिखें / हम तो केवल राम लिखें” यहाँ ‘राम’ किसी धर्म का नहीं, मर्यादा और शांति के प्रतीक है। वे गाली के जवाब में दुआ-सलाम लिखना चाहते हैं। रिश्ते, रक्षाबंधन, माँ, गुरु — इनके लिए उनके मन में अगाध सम्मान है।
शुक्ल जी ज़मीन से जुड़े लोक-चेतना के कवि हैँ।
“हरखू” हो या “दाल-बाटी”, “बोरिया-बिस्तर” हो या “कागज-पत्तर” उनकी भाषा में गाँव की मिट्टी की गंध है। वे ए. सी. कमरे के कवि नहीं हैं। वे उस हरखू को समझते हैं जो गोंडा मेल से दिल्ली आता है। उनकी भाषा में लोक-शब्दों की मिठास है और संस्कृत-निष्ठ शब्दों की गहराई भी। वे जटिल को सरल कर देते हैं, इसलिए पाठक को लगता है कि ये मेरी ही बात है।
शुक्ल जी संघर्ष को स्वीकार करने वाले कर्मयोगी कवि हैँ। “अपने फर्ज निभाने पड़ते / सबको कर्ज चुकाने पड़ते”। वे भाग्य कोसते नहीं। “फटा हुआ चद्दर” होने के बाद भी मुस्कुराकर जीने की कला जानते हैं। उनके यहाँ हताशा नहीं है, संघर्ष है। वे मानते हैं कि जीवन के चौराहों पर कविता ही संबल देती है। इसलिए उनकी कविता अंत में उम्मीद पर खत्म होती है।
सही मायने मे रविशंकर शुक्ल जी का व्यक्तित्व एक ऐसे दीपक जैसा है जो खुद जलता है, पर दूसरों को रास्ता दिखाता है। वे संवेदना के कवि हैं, विद्रोह के कवि हैं। उनकी कविता न अखबार की सुर्खी है, न दरबार की तारीफ। वह आम आदमी के सुख-दुख, हंसी-आँसू और सवालों की कविता है।
इसीलिए उनकी कविताएं छोटी होकर भी बड़ी लगती हैं। क्योंकि उनमें जीवन का शाश्वत सत्य बोलता है।
रविशंकर शुक्ल जी की “खेल” एक छोटी सी कविता है, लेकिन यह रचनाकार और पाठक दोनों को सचेत करती है। रचनाकार को इस रुप मे कि हर किसी के सामने दिल न खोलो, और पाठक को यह कि किसी की संवेदना को हल्के में न लो।
“खेल”
संवेदना से ही
कविता का सृजन होता है
संवेदना जब
द्रवित होती है तो
वही लेखनी का
प्रवाह बनती है
पर असली दिक्कत
तब शुरू होती है
जब कुछ लोग
व्यक्ति के उस
संवेदना से ही
खेलने लगते हैं।
यह कविता बहुत छोटी है, लेकिन भीतर तक चुभने वाली है। कवि ने सिर्फ 8-9 पंक्तियों में कविता के जन्म से लेकर उसके अपमान तक का पूरा सफर समेट दिया है। कविता का स्रोत – संवेदना है।
कवि का कहना है कि कविता शब्दों से नहीं, संवेदना से पैदा होती है। जब मन के भीतर कोई टीस, कोई खुशी, कोई करुणा हिलोरें मारती है, तो वही बहकर कलम की स्याही बन जाती है। “संवेदना जब द्रवित होती है तो वही लेखनी का प्रवाह बनती है”। यह पंक्ति कविता की आत्मा को पकड़ती है। यानी कविता एक तकनीक नहीं, एक अनुभव है। कवि कहता है कि समस्या तब होती है जब लोग उस संवेदना से ही “खेलने” लगते हैं। यानी जिस भाव को लेकर कवि ने खुद को उघाड़ा, उसी को दूसरे लोग खिलौना बना लेते हैं। कभी मजाक उड़ाकर, कभी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करके, कभी भावनाओं को हल्का करके। यह सिर्फ कवि की बात नहीं है। यह हर उस इंसान की बात है जिसने किसी के सामने अपना सच्चा मन खोला हो और बदले में उसे उपहास या धोखा मिला हो।
शुक्ल जी की एक कविता कबीर को अतीत से निकालकर वर्तमान के धरातल पर लाती है। यह सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, एक आह्वान है—कि आज फिर हमें उस ‘वीर’ की जरूरत है जो बिना डरे सच कहे और पाखंड पर चोट करे।
आज की
दशा और दिशा में
तुम
शिद्दत से
याद आ रहे हो कबीर!
शायद आज तक
किसी माँ ने जना नहीं
तुम से बढ़ कर
पाखंड के मर्म पर
चोट करने वाला
वीर।
यह कविता वर्तमान के आईने में कबीर को देखने का एक मार्मिक प्रयास है। कवि ने कबीर को महज इतिहास का संत न मानकर, आज की जरूरत बताया है। यह कविता *वर्तमान की पुकार* है।
“आज की दशा और दिशा में / तुम शिद्दत से याद आ रहे हो कबीर!”
पहली ही दो पंक्तियाँ कविता का स्वर तय कर देती हैं। कवि कहता है कि आज का समय—ढोंग, दिखावा, विभाजन और पाखंड से भरा हुआ है। ऐसे में कबीर की वो खरी-खरी बोलने वाली वाणी, वो बेबाकी, बहुत याद आती है। “शिद्दत से याद आना” शब्द बताता है कि यह सिर्फ साहित्यिक स्मरण नहीं, एक भीतर की तड़प है। इस कविता में ‘कबीर का अद्वितीय चरित्र’ आया है।
“शायद आज तक किसी माँ ने जना नहीं / तुम से बढ़ कर पाखंड के मर्म पर चोट करने वाला वीर।”
कवि कबीर को ‘वीर’ कहता है। यह उपाधि सोचने वाली है। कबीर ने न तलवार उठाई, न सेना बनाई। उनका हथियार था शब्द। लेकिन वे शब्द इतने तीखे थे कि सदियों पुराने पाखंड, आडंबर और ढोंग की जड़ें हिला देते थे। कवि कहता है कि कबीर जैसा निडर, बिना लाग-लपेट के सच बोलने वाला, शायद फिर कोई पैदा ही नहीं हुआ।
शुक्ल जी की एक कविता आज के समय का एक खंड-काव्य है। इसमें गुस्सा भी है, दर्द भी है, व्यंग्य भी है और उम्मीद भी। यह किसी एक भाव में नहीं ठहरती, क्योंकि जीवन भी नहीं ठहरता।
उनकी सुनें तो अपनी कैसे
बिन बादल पानी हो जैसे
जीना सीखा मझधार में
सहरा भी लगें समंदर जैसे।
हिंदू,मुस्लिम,सिख,ईसाई
आपस में सब भाई भाई
सभी पूजते अपने ढंग से
मन में मैल कहाँ से आई।
गाली,पूजा की पर्याय बनी
क्यों कर अपरिहार्य ठनी
जटिल कलुष विभेद यहाँ
सकल विलुप्त औदार्य-धनी
वह दिलकश सी गज़ल कहें
हम सब नयनों से सजल रहें
उनके अन्तर्मन में खलल रहे
पर चेहरा-मोहरा सजल रहे।
कितनी घृणा और कितना द्वेष
कैसा बन गया यह परिवेश
इन जघन्य अपराधों के बाद
बचता क्या कुछ कहने को शेष
ये रचना एक लंबी, बिखरी हुई लेकिन एकसूत्र में बँधी काव्य-माला है। इसमें अलग-अलग छंद, दोहे, ग़ज़ल-सी पंक्तियाँ हैं, लेकिन सबको जोड़ने वाली एक ही धुरी है। मानवता, संवेदना और आज के समय पर करुणा भरा सवाल । इस कविता में ‘संगठन और भाव’ है। कविता एक ही सांस में नहीं बहती, बल्कि झोंकों में आती है। कभी कबीर-सी निर्भीकता, कभी ग़ज़ल-सी नज़ाकत, कभी लोक-गीति-सी सीधी बात। यही बिखराव आज के जीवन का प्रतीक लगता है। टूटा हुआ, असंगत, पर भीतर कहीं जुड़ा हुआ।
इस कविता का प्रमुख भाव-धारा – सांप्रदायिक सौहार्द की पुकार है।
“हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई / आपस में सब भाई”
“मन में मैल कहाँ से आई”। ये पंक्तियाँ कबीर और रहीम की परंपरा में हैं। कवि सीधा सवाल करता है कि जब सबका ईश्वर एक है, पूजने का ढंग अलग हो सकता है, तो मन में ज़हर कहाँ से आया?
इस कविता में आज के परिवेश पर वेदना है।
“कितनी घृणा और कितना द्वेष / कैसा बन गया यह परिवेश” “गाली, पूजा की पर्याय बनी”
यहाँ कवि व्यंग्य और दर्द दोनों से बोलता है। धर्म, राजनीति, सोशल मीडिया — सब जगह कोलाहल है। “कोलाहल पर कोलाहल / कौन पीया यह हलाहल” — यह पंक्ति आज के शोरगुल का सार है।
इसमें व्यक्तिगत पीड़ा और दर्शन है। “दुनिया का गम पीता हूँ” “मैं तो फटा हुआ चद्दर / ऐसा पाया मैं मुकद्दर” कवि अपनी पीड़ा को सार्वभौमिक बना देता है। आम आदमी की मजबूरी, उपेक्षा, भाग्य पर सवाल — सब इसमें है। लेकिन हताशा नहीं, एक सहज स्वीकार और मुस्कुराहट भी है। इसमें रिश्ते और संस्कार हैँ।
“यह पावन पर्व रक्षाबंधन / भाई-बहन का नेह सघन” “माँ गंगोत्री का जल होती है”
बीच-बीच में कवि रिश्तों की कोमलता को याद दिलाता है। रक्षाबंधन, माँ, गुरु — ये ही वो बिंदु हैं जहाँ से समाज फिर जुड़ सकता है।
इस कविता में कर्म और ज़िम्मेदारी है।
“अपने फर्ज निभाने पड़ते / सबको कर्ज चुकाने पड़ते” “पूरी निष्ठा से करें अध्ययन / वह तब निकलते कुशाग्र बन” कवि भाग्य को रोने के बजाय कर्म पर ज़ोर देता है। यही स्वर रचना को शिकायत से ऊपर उठाकर प्रेरणा बना देता है।
शुक्ल जी की “शाश्वत सत्य” कविता नहीं, कविता का दर्शन है। यह बताती है कि कविता लिखने के लिए शब्द नहीं, जीना पड़ता है। जो जिया है, जो तड़पा है, वही जब बाहर आता है तो कविता बन जाता है—और वही सत्य समय को भी पार कर जाता है।
“शास्वत सत्य ”
भावनाएं
जब शब्दों में ढल जाती हैं
तो कविता बनती है
दिल की गहराइयों में
जो बारंबार प्रतिध्वनित है
उसे ही कभी हम गीत कहते हैं
कभी गज़ल और कभी कविता
जीवन के वियावान चौराहों,तिराहों
और दोराहों पर
जब हम कभी
किंकर्तव्यविमूढ़ होते हैं
तो अन्तर्मन की विवशता
भावनाओं में बदल जाती है
और शब्द शृंखला में ढलकर
निरंतर अग्रसर होने का संबल देती है
शायद जीवन के सतत् संघर्ष ही
हमें भावनाओं को उकेरने की
सामर्थ्य देते हैं
और अन्तर्मन से प्रस्फुटित
शास्वत सत्य ही
कविता है।
कवि का कहना है कि –
_”भावनाएं जब शब्दों में ढल जाती हैं / तो कविता बनती है” यानी कविता कोई व्याकरण का खेल नहीं, यह तो भीतर उमड़े भाव का बाहरी रूप है। जब दिल की गहराई में जो बात बार-बार गूंजती है, वही कभी गीत बनती है, कभी ग़ज़ल, कभी कविता। नाम अलग हैं, लेकिन स्रोत एक है—अनुभव।
*जीवन के चौराहे पर कविता का सहारा*
जीवन सीधा रास्ता नहीं है।
_”जीवन के वियावान चौराहों, तिराहों और दोराहों पर / जब हम किंकर्तव्यविमूढ़ होते हैं”_
ऐसे पलों में जब समझ काम करना बंद कर दे, तब अन्तर्मन की विवशता ही भाव बनकर बाहर आती है। और वही भाव शब्दों की श्रृंखला बनकर हमें फिर चलने का साहस देती है।
कविता यहाँ मनोचिकित्सक बन जाती है—बोलने न दे तो सुनती है, चलने न दे तो सहारा बनती है।
कवि का कहना है कि सुख में इंसान गुनगुनाता है, लेकिन कविता दुःख, टूटन और संघर्ष से पैदा होती है। वही संघर्ष भावों को तीखा और सच्चा बनाता है। बिना टूटे, बिना जले, शब्दों में वो ताप नहीं आता। और अंत में कवि पहुँचता है सबसे मूल बात पर— “अन्तर्मन से प्रस्फुटित शाश्वत सत्य ही कविता है” कविता झूठी तारीफ, दिखावे या अलंकार का बोझ नहीं है। वह तो वह सत्य है जो समय, स्थान और व्यक्ति से परे भी वैसा ही रहता है। प्रेम, पीड़ा, करुणा, मृत्यु, आशा—ये भाव शाश्वत हैं। और जब कवि इन्हें छूता है, तो उसकी रचना भी शाश्वत हो जाती है।
शुक्ल जी की एक कविता ‘हरखू’ के बहाने उस करोड़ों भारतीय की कहानी कहती है जो गाँव छोड़ता है सपनों के साथ, और शहर में टिक जाता है मजबूरी के साथ। इसमें न शिकायत है, न आँसू—बस एक सहज स्वीकार है। और यही स्वीकार इसे मार्मिक बना देता
हरखू चले देश भ्रमण पर ”
छोड़-छाड़ सब
गाँव का चक्कर
हरखू चले देश
भ्रमण पर
कैसे चले दाना-पानी
घर से निकले
यही सोच कर
संग ले कागज-पत्तर,
कपड़ों का
एक कनस्तर
एक हाथ में
लिए उठा और
सिर पर रखे
बोरिया-बिस्तर
पहुँचे गोंडा मेल
से दिल्ली
जहाँ गड़ी एक
लोहे की किल्ली
इस कविता में पलायन का सहज चित्रण है।
_”छोड़-छाड़ सब गाँव का चक्कर / हरखू चले देश भ्रमण पर”। पहली ही पंक्ति बता देती है कि यह ‘भ्रमण’ शौक से नहीं, मजबूरी से है। गाँव में रोज़ी-रोटी न मिले तो आदमी ‘देश भ्रमण’ पर निकल पड़ता है। सामान भी वही—कागज-पत्तर, कपड़ों का कनस्तर, बोरिया-बिस्तर। न सूटकेस, न ट्रॉली। गाँव से शहर जाने वाला आदमी आज भी ऐसे ही निकलता है। गोंडा मेल से हरखू दिल्ली पहुँचता है। _”जहाँ गड़ी एक लोहे की किल्ली”_
‘लोहे की किल्ली’ यहाँ नौकरी, व्यवस्था, या उस बड़े शहर का प्रतीक है जहाँ सब फँस जाते हैं।
_”रोज़ी-रोटी के चक्कर में / दिल्ली में ही रूक रूका गये”। भ्रमण का इरादा था, लेकिन पेट की आग ने वहीं रोक दिया। यही सच्चाई है—गाँव का आदमी शहर आता है घूमने नहीं, टिकने के लिए।
इस कविता में ‘नए रिश्ते, नया ठिकाना’ है।
_”कुछ जर-जवार के दोस्त मिले / व दिल्ली वाले दिल को भा गये”। अजनबी शहर में अपने गाँव-जवार के लोग ही सबसे पहले अपनापन देते हैं। धीरे-धीरे वही दिल्ली घर लगने लगती है। “यह सोचकर दिल्ली, रूक गए”। यही हर प्रवासी की कहानी है। ‘अस्थायी’ आना ‘स्थायी’ बन जाता है।
कविता में *व्यंग्य का हल्का स्पर्श*
_”हर जगह होता उन्नीस-बीस / इस बात का न उसे ध्यान था”। हरखू को कोई भ्रम नहीं कि दिल्ली स्वर्ग है। वो जानता है कि हर जगह कुछ कम-ज़्यादा होता है। और सबसे तीखा व्यंग्य आखिरी पंक्ति में—
_”ईस्वी भी तो दो हजार बीस” – 21वीं सदी में भी गाँव का आदमी पेट के लिए शहर भटक रहा है। विकास, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी—सबके बीच यह ‘शाश्वत’ कहानी चल रही है।
शुक्ल जी की एक कविता आज के समय में लेखक और पाठक दोनों को याद दिलाती है कि कलम ज़हर फैलाने के लिए नहीं, अमृत बाँटने के लिए है। जब सब गाली लिख रहे हों, तब ‘राम लिखने’ का चुनाव ही असली साहस है-
आओ सुबहों शाम लिखें
गाली और तमाम लिखें
कोई जिये मरे जग में
हम तो केवल राम लिखें
वह बड़का लेखक भैया
उसको राम-राम लिखें
डाह-जलन से ना फुरसत
क्यूँ पीड़ा के झाम लिखें
सनकी सनकी दुनियां में
वहका वहका जाम लिखें
हम तेरे बोल के आतुर
सबको दुआ सलाम लिखें।
यह कविता छोटी है, पर भीतर तक उतरने वाली है। इसमें एक तरफ आज की कड़वाहट है, दूसरी तरफ उससे अलग होकर ‘राम’ की तरह सरल और निर्मल रहने का संकल्प।
“आओ सुबहों शाम लिखें / गाली और तमाम लिखें”- कवि आज के माहौल की नब्ज़ पकड़ता है। सोशल मीडिया, बहस, राजनीति—सब जगह सुबह-शाम गाली और नफरत ही चलती है। जैसे लिखना भी अब गाली लिखने का नाम हो गया हो।
इसी कड़वाहट के बीच कवि कहता है “कोई जिये मरे जग में / हम तो केवल राम लिखें”। ‘राम’ यहाँ सिर्फ भगवान का नाम नहीं, सत्य, मर्यादा और शांति का प्रतीक है। कवि कहता है—दुनिया चाहे जो करे, मैं अपने लेखन को ज़हर नहीं बनाऊँगा। मेरी कलम का काम जोड़ना है, तोड़ना नहीं। “डाह-जलन से ना फुरसत / क्यूँ पीड़ा के झाम लिखें” कवि सवाल करता है—जिन लोगों के पास ईर्ष्या और जलन के अलावा कुछ नहीं बचा, वो क्यों पीड़ा बढ़ाएँ? क्यों न शांत और सकारात्मक लिखा जाए? “सनकी सनकी दुनियां में / वहका वहका जाम लिखें”। दुनिया बहकी हुई है, लेकिन कवि नशे में नहीं, होश में लिखना चाहता है। “हम तेरे बोल के आतुर / सबको दुआ सलाम लिखें”। कवि किसी से बैर नहीं रखता। वो चाहता है कि उसकी लेखनी से हर किसी तक दुआ और सलाम पहुँचे। निंदा नहीं, आशीर्वाद।
“कलियुग का खेल” नामक कविता सीधी, कड़वी और खरी-खरी है। कवि ने कलियुग की परिभाषा दो पंक्तियों में समेट दी है—_”सब पैसे का खेल है भैय्या”_। बाकी सब उसी सच के इर्द-गिर्द घूमता है।
*”कलियुग का खेल”
छांदस गाओ या परिपाटी में
चाहे शिमला या चौपाटी में
सब पैसे का खेल है भैय्या
खुश रहो फिर दाल औ’ बाटी में
यह लोकतंत्र है या है प्रहसन
पुरुषोत्तम गये हैं दंडक वन
जनकनंदिनी की वही पीड़ाएं
या कनकपुरी हो या कनक भवन
राजनीति से नीति है गायब
सभी के मिलते जुलते से ढब
किसी हाल में जीत मिलें गर
कुछ भी कर जाएंगे हम या रब।
_”छांदस गाओ या परिपाटी में / चाहे शिमला या चौपाटी में” चाहे तुम शास्त्र की भाषा बोलो या लोक-गीत, चाहे हिमालय की वादियों में रहो या मुंबई की चौपाटी पर— “सब पैसे का खेल है भैय्या”_ कवि बता रहा है कि मूल्य, रिश्ते, सिद्धांत सब बाज़ार में तौल दिए गए हैं। फिर भी व्यंग्य में सलाह देता है—_”खुश रहो फिर दाल औ’ बाटी में”_। यानी जब सब बिक रहा है, तो कम में संतोष कर लो। *लोकतंत्र या प्रहसन?* _”यह लोकतंत्र है या है प्रहसन” यह सवाल आज सबसे बड़ा है। कवि सीधा रामायण का सहारा लेता है_”पुरुषोत्तम गये हैं दंडक वन / जनकनंदिनी की वही पीड़ाएं” राम वन गए, सीता की पीड़ा वही रही। आज भी सत्ता में वही खेल, वही अन्याय, वही नारी-वेदना। _”या कनकपुरी हो या कनक भवन” सोने की लंका हो या अयोध्या का भवन—बिना नीति के सब माया है।
. *नीति का लोप* _”राजनीति से नीति है गायब / सभी के मिलते जुलते से ढब” कवि का सबसे तीखा प्रहार यहाँ है। न दाएँ-बाएँ में फर्क बचा, न सत्ता-पक्ष विपक्ष में। सबका तरीका एक ही—_”किसी हाल में जीत मिलें गर / कुछ भी कर जाएंगे हम या रब”_।
जीत के लिए साधन-शुद्धि का सवाल ही खत्म हो गया है।
“कालिंदी कूल” सिर्फ प्रेम-कविता नहीं, ब्रज-भूमि की स्मृति-कविता है। प्रिया के रूप में कवि ने राधा, यमुना और वृंदावन—तीनों को एक कर दिया है। पढ़ते हुए लगता है कि हम भी यमुना किनारे खड़े हैं, जहाँ हर कण में प्रेम बसा है।
“कालिंदी कूल”
जितना उसको भूलें हम
उतना दिल से छू लें हम
वही मेरी सारी खुशियां
उसी के हिस्से सारा गम
वह तो पावन शबनम सी
वह लगती सुंदर पूनम सी
उसका नृत्य मोरनी सा
छम छमा छम छम छमा छम
वह निश्छल है, हलचल है
उसका नेह गंगा -जल है
वह प्रिय वृषभानु लली की
उन नयनों में है वृंदावन
उर्वशी कहूं या दमयंती
कालिदास की शाकुंतल सी
उसके मन में नित्य बसे
कालिंदी कूल के कण कण।
_”जितना उसको भूलें हम / उतना दिल से छू लें हम”_ पहली ही पंक्ति में कवि प्रेम का सबसे बड़ा सत्य कह देता है भूलने की कोशिश जितनी करोगे, याद उतनी गहरी हो जाएगी। खुशियाँ और गम दोनों उसी को सौंप दिए—_”वही मेरी सारी खुशियाँ / उसी के हिस्से सारा गम”_। प्रिया अब सिर्फ व्यक्ति नहीं रही, वो भावों का केंद्र बन गई।
कवि प्रिया को तुलना के लिए दूर नहीं जाता, अपने परिवेश से ही उपमाएँ चुनता है। “पावन शबनम सी” पवित्रता और नमी। “सुंदर पूनम सी” शीतलता और पूर्णता “नृत्य मोरनी सा / छम छमा छम छम छमा छम” ब्रज की माटी की लय और ध्वनि
यहाँ शब्दों से ज्यादा ध्वनि बोलती है। ‘छम छमा छम’ पढ़ते ही कानों में घुंघरू बजने लगते हैं। “वह निश्छल है, हलचल है / उसका नेह गंगा-जल है”_
प्रिया में चंचलता भी है, स्थिरता भी। प्रेम में उछाल भी है और निर्मलता भी। और फिर वो ब्रज से जुड़ जाती है—_”उन नयनों में है वृंदावन”_। उसके नेत्रों में पूरा ब्रजधाम समा गया है। राधा का रूप यहाँ साक्षात हो जाता है। कवि अंत में प्रिया को भारतीय साहित्य की महान नायिकाओं के साथ रखता है—
_”उर्वशी कहूँ या दमयंती / कालिदास की शाकुंतल सी” लेकिन उसका असली घर कहीं और है— _”उसके मन में नित्य बसे / कालिंदी कूल के कण कण” यानी वो शाकुंतला नहीं, राधा है। यमुना किनारे की मिट्टी, हवा, ध्वनि सब उसी में बसते हैं।
रविशंकर शुक्ल जी के काव्य की भाषा बहुत सहज और सीधी है। कोई क्लिष्ट शब्द नहीं, कोई अलंकार का बोझ नहीं। “खेल” शब्द आखिर में आकर पूरे अर्थ को बदल देता है। कविता में कोई अलंकार का बोझ नहीं, कोई क्लिष्टता नहीं। “पाखंड के मर्म पर चोट” जैसी पंक्तियाँ कबीर की अपनी शैली की याद दिलाती हैं। सीधे दिल पर वार करने वाली। भाषा लोक-भाषा के करीब है। कहीं उर्दू-फारसी का मिठास “दिलकश, मुकद्दर, खल”, कहीं हिंदी की मिट्टी “चद्दर, चरचरर, गच्चे”। छंद बंधा हुआ नहीं है। कहीं दोहा, कहीं चौपाई-सी लय, कहीं ग़ज़ल। यह आज के कवि की आज़ादी है। भाव के आगे छंद झुके। प्रतीक सीधे और सहज हैं। बादल-पानी, सहरा-समंदर, चद्दर-मुकद्दर, हलाहल-अमृत। कहीं – कहीं भाषा संस्कृत-निष्ठ, पर भारी नहीं। “वियावान चौराहे”, “किंकर्तव्यविमूढ़”, “प्रस्फुटित” जैसे शब्द कविता को गंभीरता देते हैं। पूरी रचना गद्य-काव्य की तरह बहती है। न छंद का बंधन, न तुक का दबाव। भाव ही लय है। भाषा लोक-जीवन की मिट्टी से सनी है और भाव में व्यंग्य, करुणा और सहजता तीनों हैं। फिर भी शुक्ल जी की भाषा पूरी तरह लोक-भाषा है। ‘कागज-पत्तर’, ‘बोरिया-बिस्तर’, ‘जर-जवार’। कोई क्लिष्ट शब्द नहीं। लय लोकगीत जैसी है, जिसे पढ़ते ही गाँव का मेला, रेलवे स्टेशन और भीड़ की आवाज़ें कानों में गूँजने लगती है। भाषा और बोलचाल की है। ‘बड़का लेखक भैया’, ‘वहका वहका जाम’। तुक और लय लोकगीत जैसी है, जो पढ़ते ही गुनगुनाने लगती है। बार-बार ‘लिखें’ शब्द दोहराकर कवि अपने संकल्प को पक्का करता है। कुल मिलाकर भाषा लोक-भाषा और शास्त्र दोनों का संगम है। “दाल-बाटी”, “भैय्या” जैसे शब्द गाँव की मिट्टी से आते हैं, तो “पुरुषोत्तम”,”जनकनंदिनी”, “कनकपुरी” संस्कृत-निष्ठ गहराई देते हैं। तुकबंदी सहज है, पढ़ते ही व्यंग्य गले उतर जाता है। भाषा ब्रज-भाषा के रंग में भी रंगी है। ‘कालिंदी कूल’, ‘वृषभानु लली’, ‘गंगा-जल’ जैसे शब्द कविता को भक्ति-संगीत की गंध देते हैं। लय हल्की, तुक सहज, और भाव में माधुर्य, यही इसे गीत बनने लायक बनाता है।
डा. सीमांत प्रियदर्शी
वाराणसी
मो.फोन नं. 8707343177



