
कहीं डीज़ल भरवाते बलि चढ़ती डॉक्टर बेटी की,
कहीं अस्मत लुटती देखी उस मासूम सयानी की।
तीन साल की कली सुरक्षित, न साठ साल की दादी है,
मानवता को डसने वाली, फैली यह बर्बादी है।
नरभक्षी घूम रहे हैं बाहर, पहने इंसानी चोला,
राम-राम है मुख पर इनके, भीतर विष का है गोला।
मंचों पर जो नारी शक्ति का लंबा भाषण देते हैं,
पीठ पीछे वे गिद्ध बनकर, नोच कली को लेते हैं।
इंद्र, गीदड़ और दरिंदे, इस समाज के बीच ही पलते,
सूरज ढलते ही ये कीड़े, अंधेरों में हैं निकलते।
कब तक सहेंगी बेटियाँ, यह खौफनाक नज़ारा,
जब रक्षक ही मौन खड़े हैं, छूटा हर सहारा।
उखाड़ फेंको इन मुखौटों को, जो सच को दबाना चाहते हैं,
बेटियों के लहू पर जो, अपनी सत्ता चमकाते हैं।
अब कलम नहीं थमेगी, अब आवाज़ नहीं दबेगी,
इन आदमखोरों के आगे, अब यह चेतना नहीं झुकेगी।
कवयित्री ज्योति बरनवाल
नवादा (बिहार)




