आलेख

आधुनिक संसार के चुभते हुये प्रश्न

डॉ. शीलक राम आचार्य

यह वास्तविकता है कि इस संसार और इन संसारीजन को जो जितना अधिक समझने में समर्थ होता जाता है,वह उतनी ही मात्रा में अकेला होता जाता है। कोई कुछ भी कहे लेकिन यही यहां की वास्तविकता है। अपनों का दूर चले जाना तथा विरोधियों का समीप आते जाना भी इसी का अहम् हिस्सा है।आज के अपने ही कल पराये हो जाते हैं तथा आज के पराये ही कल को अपने हो जानेवाले हैं।यह भी वास्तविकता है।ऐसा लगता है कि अधिकांश लोगों का किसी के समीप आना तथा किसी से दूर चले जाना केवल स्वार्थ पर आधारित है।प्रेम, प्यार, मैत्री, दोस्ती आदि तो केवल बहाना होते हैं किसी के समीप आने के। यदि वास्तव में ही प्रेम, प्यार आदि होते हैं, तो आज जीने और मरने की कस्में खाने वाले लोगों को स्वार्थपूर्ति के पश्चात् अपनों में ही अनेक कमियां कैसे दिखलाई देने लगती हैं?जब किसी से स्वार्थ साधना होता है, तो उसमें गुण ही गुण दिखलाई देते हैं तथा स्वार्थ सिद्ध हुआ नहीं कि दुश्मनी, विरोध, बुराई और कमियां दिखलाई देने लगती हैं।इसक अर्थ तो यह है कि वास्तव में प्रेम, प्यार, मैत्री आदि होते ही नहीं हैं।बस, क्योंकि काम निकालना है,अतः प्रेम, प्यार, मैत्री आदि का ढोंग करना आवश्यक हो जाता है।काम निकलने पर भीतर छिपे हुये विरोध, दुश्मनी, वैरभाव, गाली-गलौज आदि ऊपर आ जाते हैं। संसार में ऐसा कौन मनुष्य है,जिसने अपनों से ही धोखे नहीं खाये हैं? संसार में ऐसा कौन है, जिसकी पीठ में उसके अपनों ने ही चाकू नहीं घोंपे हैं?यही दुनियावी लोगों की हकीकत है।जो इस हकीकत को समझ और जान लेता है,वह मित्रों और दुश्मनों में संतुलन बनाकर जीवन जीता है। किसी को भी अपनी तरफ से सीमा से अधिक समय,सहयोग और सम्मान मत दो। किसी की अधिक समय तक प्रतीक्षा मत करो। किसी पर सीमा से अधिक विश्वास मत करो।आज किसी की आपने जो सहायता की है, बदले में उससे ठीक उसी मात्रा और समर्पण में सहयोग पाने की आशा मत पालो।यह भ्रम,भरोसा और आश्वासन कल को आपके जीवन में दुख ही लेकर आयेगा। किसी की सहायता करने और उनसे आशा रखने में संतुलन आवश्यक है।
निज मातृभूमि से उखड़े हुये, फैमीनीज्म से प्रेरित और पल्लवित फिल्मी उद्योग, सोशल मीडिया से जुड़े हुये लोग,सोशल मीडिया पर अर्द्धनग्न रील डालने वाला वर्ग बोल्डनैस का मतलब नग्न होना मानते हैं। जिसके शरीर पर जितने कम कपड़े होंगे, उसे उतना ही अधिक बोल्ड माना जाता है।
बोल्डनैस को नग्नता,उघाडेपन और अंग -प्रदर्शन से जोड़ दिया गया है।बोल्डनैस को शरीर की कामुक मुद्राओं से आंका जा रहा है।नारी के शरीर पर जितने कम वस्त्र होंगे,वह उतनी ही अधिक बोल्ड, सुंदर और बोल्ड दिखेगी।यदि इस प्रकार के अंग-प्रदर्शन,उघाडेपन और कामुक मुद्राओं को ही बोल्डनैस माना जायेगा तो फिर पुरुषों को भी ऐसा ही करना चाहिये। पुरुषों को भी बोल्ड क्यों नहीं होना चाहिये?बोल्डनैस का पैमाना लड़कियों और लड़कों के लिये भिन्न भिन्न क्यों है?
क्या पुरुषों के पास नग्न और उघाडा होकर दिखाने के लिये कुछ भी नहीं है?यह आश्चर्यजनक है कि यदि कोई लड़का उघाड़ा होता है,तो वह असभ्यता और फूहड़ता माना जाता है लेकिन लड़कियों के संबंध में इसका बिल्कुल विपरीत है। लड़कियों के लिये नग्नता और उघाडापन सौंदर्य का प्रतीक बन गया है।ऐसे में नैतिकता तो कहीं दिखाई ही नहीं देगी। हमारे सनातन जीवनमूल्यों का क्या होगा? आजकल तो मानवीय मूल्यों, नैतिक मूल्यों और भारतीय ज्ञान परंपरा जैसे विषयों के अध्ययन अध्यापन को भी आवश्यक कर दिया गया है। फिल्मी उद्योग और सोशल मीडिया पर भी यह नीति लागू होना चाहिये।
लड़की हो या लडका हो-उघाडा होकर वो क्या दिखाना और क्या छिपाना चाहते हैं?इसका क्या रहस्य है?कुछ तो ऐसा जरूर है, जिस पर कोई भी खुलकर बोलना नहीं चाहता है। यदि कोई बोलने का दुस्साहस करे भी तो उस पर सभी नग्नता समर्थक और नैतिकता विरोधी लोग टूट पड़ते हैं। लगता है कि ये दोनों वर्ग इस नग्नता की आड़ लेकर अपनी दमित- ऊर्जा का रेचन करके राहत महसूस करने पर लगे हुये हैं।
सोचने की बात यह भी है कि यदि नग्नता और उघाडापन ही सौंदर्य या बोल्डनैस या प्रतिभा का आंकलन है,तो ऐसे में तो गधे, कुत्ते, बिल्ली,सुअर,भैंस,झोटे आदि पशु अधिक बोल्ड, सुंदर और प्रतिभाशाली हैं।
लगता है कि अपने खालीपन, अपने अकेलेपन, अपने तनाव,अपनी हताशा और अपनी चिंता को युवाशक्ति -वर्ग अपनी और अन्यों की कामुकता को उत्तेजित करके उससे राहत पाना चाहते हैं। इन सबके आगे, पीछे,ऊपर, नीचे और बीच में सर्वत्र उच्छृंखल कामुकता प्रधान हो गई है।आहार निद्रा,भय और मैथुन किसी भी प्राणी के लिये आवश्यक होते हैं, लेकिन इस तरह से इन्हीं में डूबकर जीवन जीना पशुओं के लिये सही कहा जा सकता है, मनुष्य प्राणी के लिये नहीं।
पिछले कुछ दशकों से यह इस प्रकार की जीवन- शैली अवगुण की जगह गुण में परिवर्तित हो गई है।इसे फैशन या आधुनिकता या आजादी या समान अधिकार कहकर महिमान्वित किया जा रहा है।
व्यापार, राजनीति, उद्योग- धंधों,कोरपोरेट -घरानों,होटल- व्यवसाय, फिल्म -उद्योग, धर्म,योग,कथा, सत्संग, जागरण, शिक्षा, परिवहन और विज्ञापन आदि सभी क्षेत्रों के चालाक लोगों ने महिला- वर्ग की इस नग्नता और उघाडेपन को अपने व्यापारिक हित साधने का जरिया बना लिया है।
आज किसी को कुछ भी बेचना हो तो वह विज्ञापन के रूप में महिलाओं की नग्नता और उघाडेपन का सहारा लेता है। चतुर और धूर्त लोग रुपया कमा रहे हैं लेकिन बहुसंख्यक जनमानस का जमकर शोषण हो रहा है। नैतिकता,जीवन-मूल्य, सात्विकता, सरलता,सहजता,संयम, अनुशासन आदि जायें भाड़ में।
आपने खूब देखा होगा कि जून की तपती गर्मी में जो लोग सूर्य को गालियां देते हैं,वहीं लोग सर्दी में उसी सूर्य की बड़ाई करते नहीं थकते हैं।जिस गरीब का कोई मुंह तक देखना अपशकुन समझते हैं,वही गरीब अमीर बनने पर सभी के लिये सम्मानित हो जाता है।जिस मरियल व्यक्ति को कोई भी ऐरा- गेरा कंधा मारकर निकल जाता है,बदमाश या अपराधी बनने पर उसी व्यक्ति को सभी राम -राम करते हुवे निकलने लगते हैं।गरीब की जोरु सबकी भाभी,धन-दौलत हर ताले की चाबी।यहा पर सम्मान व्यक्ति को नहीं अपितु उसकी दौलत को मिलता है।अंटी में रुपया आया नहीं कि भोंदू भी विद्वान कहलवाने लगते हैं और टोटा आया नहीं कि गली के कुते भी विद्वान व्यक्ति को काटने के लिये दौड़ने लगते हैं।सादा कपड़े पहनकर किसी विवाह या कार्यक्रम या रेलगाड़ी या बस में जाओ,सभी हिकारत भरी नजरों से देखेंगे तथा गंवार, देहाती और पिछड़ा कहकर दुतकारेंगे। लेकिन वही व्यक्ति बढ़िया और महंगा सूट,टाई पहनकर चला जाये तो सभी उसको पढा- लिखा समझकर सलाम ठोकेंगे। चरित्र और व्यक्तित्व का निर्धारण गुणों से नहीं अपितु कपड़ों से किया जाने लगा है। किसी में चाहे कितने ही अवगुण मौजूद हों लेकिन दो चार -वाक्य अंग्रेजी में बोलते ही वह उच्च- शिक्षित और समझदार बन जाता है। इसके विपरित कोई कितनी भी परिनिष्ठित और धाराप्रवाह हिंदी में बोलने की कोशिश कर ले लेकिन उसे कहेंगे परंपरावादी और लकीर का फकीर ही। इतनी अंधेरगर्दी?
ये दुनिया ऐसी ही है। यहां पर भ्रष्ट से भ्रष्ट, अपराधी और बलात्कारी नेताओं और धर्मगुरुओं के भी लाखों अनुयायी हो सकते हैं। यहां पर दिन -रात मेहनत,निष्ठा,निष्पक्षता और नैतिकता से राष्ट्र, संस्कृति और धर्म -हित के लिये काम करने वालों को गालियां देने वाले भी करोड़ों व्यक्ति मौजूद हैं। विचित्र है यह संसार। आखिर लोग ऐसा क्यों करते हैं? जनसाधारण ही नहीं अपितु पढे -लिखे लोग भी ऐसा ही करते हुये नित्यप्रति देखे जा सकते हैं। जनसाधारण पाखंडी नहीं है बल्कि तथाकथित पढ़ें लिखे लोग पाखंड को प्रश्रय अधिक देते हैं। ये अपनी सारी पढ़ाई- लिखाई का इसी तरह से दुरुपयोग करते हैं। और उदाहरण देंगे विष्णु पुराण का- ‘सा विद्या या विमुक्तये’ तथा हितोपदेश का -‘विद्या ददाति विनयम्’।
शब्दों के साथ खेलने वाले लोग पता नहीं क्या से क्या सिद्ध करके स्वयं को लेखक,साहित्यकार,समीक्षक और विचारक प्रसिद्ध करना चाहते हैं। इन्हें बहुत जल्दी होती है, स्वयं को अल्प समय में प्रसिद्ध होने की। जाने- अनजाने संदर्भ से हटकर बाते करना इनकी मानसिकता होती है।हरेक भाषा में एक ही शब्द के कई होते हैं। मूल ग्रंथ लेखक की मानसिकता को न समझकर संदर्भ के साथ छेड़छाड़ करने से सब गुड़- गोबर हो जाता है। इनको इतनी अक्ल तो होनी ही चाहिये कि मूल ग्रंथ लेखक के साथ थोड़ा सा न्याय कर सकें। यदि वास्तव में ही इनमें लेखक या साहित्यकार का थोड़ा सा अंश भी मौजूद है, तो इन्हें किसी भाषा के मूल शब्द और उस शब्द के प्रचलित अर्थ -इन दोनों को निष्पक्षता से बतलाना चाहिये। लेकिन ये ऐसा नहीं करते हैं!क्यों? क्योंकि इन्होंने अपनी एक धारणा बना ली होती है कि मुझे तो बस यही सिद्ध करना ही है। इसके लिये चाहे कितनी भी तोड़-मरोड़कर और धींगामुश्ती करनी पड़े। जैसे हम कन्यादान और सनातन शब्दों को ले सकते हैं।विदेशीय जीवन-शैली से प्रभावित लोग इस कला में माहिर हैं।इनमें अपने आपको जाति और वर्गरहित माननेवाले लोग सबसे कम अक्ल और सबसे अधिक पूर्वाग्रहग्रस्त होते हैं।’कन्यादान’ शब्द को लेकर कुछ लोगों द्वारा सनातन संस्कृति और कर्मकांडों का उपहास किया जाता रहा है। यहां पर आलोचक ‘कन्यादान’ में दान शब्द का अर्थ भौतिक वस्तुओं के समान करके श्रोताओं को बरगलाने की कोशिश की है। यहां पर दना का अर्थ भौतिक वस्तुओं के समान कुछ देना नहीं है।इस दान में अभिभावकों द्वारा अपनी पुत्री का दायित्व या जिम्मेदारी विवाहोपरांत किसी दूसरे घर में वर को सौंप देना है।इस दान में दायित्व-बोध,सात्विकता,जिम्मेदारी, करुणा,पवित्रता, सम्मानपूर्वक सहजीविता और जीवंतता का अहसास मौजूद हैं। ‘कन्यादान’ में दान शब्द विद्यादान,भोजनदान,अन्नदान की तरह न होकर आध्यात्मिकता को लिये हुये है।कुछ दूसरे प्रकार के लोगों ने इस शब्द को सनातन -धर्म और संस्कृति को नीचा दिखाने के लिये प्रयुक्त किया है।यह बुद्धिहीनता की पराकाष्ठा है।
ठीक इसी तरह से एक वर्ग के विचारकों द्वारा सनातन,स्तुप,दुख, तृष्णा,चतुर्व्यूह,बुद्ध,निर्वाण आदि शब्दों को लेकर वितंडा के द्वारा बालवत् कोरा वाग्जाल निर्मित किया जाता है। लेकिन इस वाग्जाल के पीछे सनातन -धर्म और संस्कृति के प्रति घृणा मौजूद होती है। ऐसे बुद्धिहीनों को न तो शास्त्रों का ज्ञान है,न व्याकरण का ज्ञान है,न निरुक्त का ज्ञान है,न पुरातन और आधुनिक भाषाविज्ञान का क ख ग भी आता है।इनकी बातें मात्र शब्दों की लफ्फाजी होती है। जनसाधारण को बरगलाने में ये सफल हो रहे हैं।सनातन, बुद्ध,स्तुप, निर्वाण, तृष्णा,दुख आदि शब्द वेदों, उपनिषदों और दर्शनशास्त्र में मिल गये तो इसका मतलब ये मूढ़ यह लगाते हैं कि उपरोक्त ग्रंथ सिद्धार्थ गौतम के पश्चात् के हैं।जैसे मेरा खुद का नाम ‘शिलक’ छांदोग्य उपनिषद् के प्रथम प्रपाठक के आठवें खंड में तीन- चार बार आया है। इन बुद्धि के दुश्मनों के अनुसार इसका तो यह मतलब हुआ कि छांदोग्य उपनिषद् मेरे जन्म के पश्चात् लिखा गया ,क्योंकि इस उपनिषद में मेरा नाम कयी बार आया है। बे-सिर-पैर, तर्कहीन,संदर्भ से हटकर और वितंडापूर्ण संवाद करने में अनेक संगठन और विचारक एक -दूसरे से बढ़कर हैं।
भौतिक तल व्यक्ति के जीवन का ऊपरी और सतही तल है।केवल इसी पर काम करके व्यक्ति के सभी तलों की समस्यायों का निवारण नहीं हो सकता है। विज्ञान भी जब अवैज्ञानिक काम करता है तो उस पर टीका टिप्पणी करना उसी तरह से गलत हो गया है जिस तरह से धर्म पर टिप्पणी करने से कट्टर धार्मिक लोग नाराज़ हो जाते हैं।इसका अर्थ तो यह हुआ कि विज्ञान भी कट्टरता का शिकार हो गया है। लेकिन ध्यान रहे कि उधार की प्राप्ति से आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है। लेकिन नैतिकता, सद्गुण आदि का विकास तो स्वयं के सुधार, परिष्कार, अनुशासन,शोधन, साधना आदि से ही संभव हो सकता है।जोर जबरदस्ती करके मानव मस्तिष्क सहित समस्त तंत्रिका तंत्र से छेड़छाड़ करना घातक सिद्ध होगा। भौतिक और आध्यात्मिक स्तर पर संतुलन समस्त जड़-चेतन जगत् के हित में है। भौतिक स्तर पर अधिकांश में कार्य हो रहा है लेकिन चेतना के तल पर काम करने के लिये शायद ही कोई तैयार होगा। सनातन धर्म,संस्कृति,दर्शनशास्त्र,आचारशास्त्र और न्यायशास्त्र संतुलित विकास के समर्थक हैं। लेकिन दिक्कत यही है स्वयं के आचरण पर कार्य न करके एकतरफा भौतिक विकास से ही सब कुछ प्राप्त कर लेने की सनक भौतिकविज्ञानियों पर सवार हो चुकी है। इसके दुष्प्रभाव हम सबके सामने हैं। जितना अधिक भौतिक विज्ञान में विकास हुआ है, संसार में समस्याओं का बढते जाना जारी है।जो कोई भी चेतना या अध्यात्म या ‘स्व’ पर कार्य करने के लिये कहता है, उसे पंपरावादी या रूढ़िवादी या पिछड़ा हुआ कहकर उपहास किया जाता है।’स्व’ की खोज तो करनी ही होगी।’स्व’ को तो जानना ही होगा।स्व का साक्षात्कार तो करना ही होगा। उसके बगैर व्यक्ति शांत, संतुष्ट और तृप्त नहीं हो सकता है।और केवल विज्ञान के द्वारा जगत् की सभी समस्याओं का हल करने का दावा करने वालों इस प्रश्न का जवाब देना चाहिये कि चमत्कारी वैज्ञानिक विकास के बावजूद संसार में भूखमरी, बेरोजगारी, गरीबी, अभाव, बदहाली, तनाव, अकेलापन,आतंक, युद्ध आदि क्यों बढ रहे हैं? केवल यह कहने भर से काम नहीं चलेगा कि विज्ञान और वैज्ञानिक खोजों का सही उपयोग नहीं किया जा रहा है।यह टिप्पणी तो धर्म के संबंध में की जा सकती है। धर्म और धार्मिक खोजों का भी सही उपयोग नहीं हो रहा है।इस आधार पर यदि विज्ञान अपनी जगह पर सही है तो धर्म भी अपनी जगह पर सही है। यदि विज्ञान निर्दोष है तो धर्म भी निर्दोष है। फिर केवल धर्म पर पाखंड, ढोंग, शोषण, भेदभाव, छुआछूत का आरोप क्यों लगाया जाता है? केवल धर्म को ही टारगेट क्यों किया जाता है? विज्ञान के कारण भी इस धरती और इस पर वास करने वाले प्राणियों तथा जल,वायु,आकाश, पहाड़, नदियां, झरने,तालाब आदि प्रदुषित और विषाक्त हो चुके हैं। अपनी जगह पर धर्म, विज्ञान,अध्यात्म,योग, चिकित्सा आदि सभी सही हैं,यदि गलत है तो केवल मानव प्राणी।इसी ने स्वार्थ में अंधा होकर इस धरती को नारकीय बना दिया है।
…………
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!