साहित्य

दिसंबर की अंतिम हलचल

दिनेश पाल सिंह दिलकश

दिसंबर की ये अंतिम हलचल,
दिल में कोई दीया जलाए।
बीते लम्हों की थके तरंगें
धीमे–धीमे पास बुलाएँ।
दिसंबर की ये अंतिम हलचल…

ओस भरे उन पलों की खुशबू
अब भी साँसों में घुलती है,
हर धड़कन पर कोई धुंधली
पुरानी दास्तां मिलती है।
जाने क्यूँ ये रात सुहानी
आँखों में आकर छलक जाए…
दिसंबर की ये अंतिम हलचल…

सूनी-सी गलियों का पहरा,
ठंडी हवा गुनगुनाती है,
मन के कोने में बैठी स्मृतियाँ
धीरे से आँचल लहराती हैं।
सुन ले दिल तू पत्तों का स्वर—
हर गिरता पत्ता कुछ कह जाए…
दिसंबर की ये अंतिम हलचल…

थोड़ी ठिठुरन, थोड़ी मिट्टी,
थोड़ा सा बीतेपन का साया,
थोड़ी उम्मीदों की चिंगारी—
थोड़ा सा “फिर से मुस्काया”।
वक़्त किनारे खड़ा मुसकाकर
नए सफ़र का राग सुनाए…
दिसंबर की ये अंतिम हलचल…

चल पड़ना है अगली राहों पर,
पर मन को ये समझाना कठिन,
कितना हसीन था यह मौसम—
कितना अपना-सा हर क्षण।
फिर भी दिल में सूरज-सी
नयी किरण कोई जगमग आए…
दिसंबर की ये अंतिम हलचल…

दिनेश पाल सिंह दिलकश
जनपद संभल

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!