गुरुकुल से गुलामी तक : मैकाले की ट्रिपल सी पॉलिसी और सनातन ज्ञान पर प्रहार
डाॅ.शिवेश्वर दत्त पाण्डेय

भारतीय सनातन संस्कृति की आत्मा गुरुकुल परम्परा में निहित रही है। गुरुकुल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं था, बल्कि यह जीवन-मूल्यों, चरित्र-निर्माण, आत्मबोध और सामाजिक उत्तरदायित्व का संस्कार स्थल था। यहाँ शिक्षा का उद्देश्य आजीविका भर नहीं, बल्कि जीवन को जीने की कला सिखाना था। गुरु और शिष्य का संबंध श्रद्धा, अनुशासन और तपस्या पर आधारित होता था, जहाँ ज्ञान लोक-कल्याण के लिए अर्जित किया जाता था।
सनातन परम्परा में शिक्षा प्रकृति, समाज और अध्यात्म के समन्वय से विकसित हुई। वेद, उपनिषद, दर्शन, आयुर्वेद, गणित, खगोल, व्याकरण, शिल्प और नीति—सब कुछ गुरुकुल व्यवस्था के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित और विकसित होता रहा। यही कारण था कि भारत को विश्वगुरु के रूप में सम्मान प्राप्त हुआ।
किन्तु औपनिवेशिक काल में लॉर्ड मैकाले द्वारा प्रतिपादित ट्रिपल सी पॉलिसी—क्लर्क, क्रिश्चियन और कंट्रोल्ड माइंड—ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था की जड़ों पर गहरा आघात किया। इस नीति का उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से ऐसे वर्ग का निर्माण करना था जो “रंग से भारतीय, पर विचार से अंग्रेज” हो। परिणामस्वरूप गुरुकुलों को अवैज्ञानिक, पिछड़ा और अनुपयोगी घोषित कर धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल दिया गया।
मैकाले की शिक्षा नीति ने ज्ञान को रोजगार-केन्द्रित बना दिया और संस्कृति से उसका संबंध तोड़ दिया। अंग्रेज़ी भाषा को श्रेष्ठ ठहराकर संस्कृत, प्राकृत और भारतीय भाषाओं को हेय दृष्टि से देखा गया। इससे न केवल भाषा का ह्रास हुआ, बल्कि उनमें निहित सनातन ज्ञान-परम्परा भी उपेक्षित होती चली गई। शिष्य को आत्मनिर्भर और मूल्यनिष्ठ बनाने वाली शिक्षा, केवल सरकारी नौकरी के लिए प्रशिक्षित करने वाली प्रणाली में बदल गई।
इस प्रक्रिया में सनातन संस्कृति को भी व्यवस्थित रूप से कमजोर किया गया। धर्म, दर्शन और परम्पराओं को रूढ़िवाद बताकर भारतीय आत्मबोध को हीन भावना से भर दिया गया। शिक्षा का उद्देश्य समाज निर्माण से हटकर सत्ता और व्यवस्था की सेवा तक सीमित कर दिया गया। यह मानसिक दासता स्वतंत्रता के बाद भी लंबे समय तक बनी रही।
आज आवश्यकता है कि हम इतिहास की इस त्रुटि को समझें और गुरुकुल परम्परा के मूल तत्वों—गुरु-शिष्य परम्परा, मूल्यपरक शिक्षा, भारतीय भाषाएँ और सनातन दृष्टि—को आधुनिक संदर्भ में पुनर्स्थापित करें। आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ यदि सनातन ज्ञान का समन्वय किया जाए, तो भारत पुनः ज्ञान-प्रधान राष्ट्र बन सकता है।
मैकाले की ट्रिपल सी नीति ने भले ही हमारे शैक्षिक ढांचे को कमजोर किया हो, पर सनातन संस्कृति की जड़ें आज भी जीवित हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम अपने बौद्धिक स्वाभिमान को पहचानें और शिक्षा को फिर से संस्कृति, संस्कार और ज्ञान के पवित्र त्रिवेणी से जोड़ें। यही सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय पुनर्जागरण की दिशा होगी।
(लेखक दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह के संस्थापक और समूह सम्पादक हैं)




