साहित्य

वो जिन्दगी में न कुछ

कनक

वो जिन्दगी में न कुछ ताज़गी भी होती है
जो आशिकी से ही सब दुश्मनी भी होती है।।//१//

बहे है जब से अश्क़ आंख से जुदा हो के
वो दोस्ती भी न कुछ दोस्ती भी होती है।।//२//

रुठे से यार है मेरे न दिल के पास रहते
तमाम शहर में दिल से तामसी भी होती है।।//३//

ग़लत लगा हमको भी ये बात है सब कुछ
अगर कुछ न सही बेबसी भी होती है।।//४//

खुशगवार है वो अपने में यार अब मुझको
कभी जो दर्द में थोड़ी कमी भी होती है।।//५//

कनक

 

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