प्रयागराज के व्यंग्यकार जयचन्द प्रजापति की शैली: लोकधर्मी हास्य से सामाजिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार

प्रयागराज। हिंदी साहित्य में लोकधर्मी, सहज व्यंग्य के लिए विख्यात जयचन्द प्रजापति की रचनाएँ प्रयागराज की स्थानीय बोली और रोजमर्रा के जीवन से प्रेरित होकर समाज के ढोंग, अंधभक्ति व मानवीय कमजोरियों को हास्य के माध्यम से उजागर करती हैं।
उनकी शैली ठेठ ग्रामीण भाषा, मुहावरों और बोलचाल के सहज प्रयोग से सजी है, जो व्यंग्य को जीवंत बनाकर आमजन से जोड़ती है।भाषाई शिल्प में देसी छाप उनकी रचनाओं में अतिशयोक्ति, विडंबना और आत्मकथात्मक पात्रों के जरिए फेसबुकिया संस्कृति, राजनीतिक चमचई व सामाजिक दिखावे पर करारा प्रहार होता है।
भाषा सरल व प्रयागराजी बोली से युक्त है, जिसमें ‘हमरे पल्ले ना पड़ा’, ‘चमचा’ जैसे शब्द लोकानुभव को जीवंत करते हैं। हरिशंकर परसाई की तीक्ष्णता से भिन्न उनकी शैली अधिक देसी और करुणामय है, जो पाठक को हँसाते हुए सोचने पर मजबूर कर देती है।
प्रजापति का व्यंग्य शोषण, भ्रष्टाचार व सांस्कृतिक पाखंड पर निशाना साधकर समाज सुधार का माध्यम बनता है। फेसबुक व पत्रिकाओं पर सक्रियता उन्हें समकालीन बनाती है, जो प्रयागराज की व्यंग्य परंपरा को लोक अनुभव से जोड़कर समृद्ध कर रही है। साहित्य प्रेमी उनकी रचनाओं में हास्य-व्यंग्य के संतुलन को सराहते हैं, जो मनोरंजन के साथ गहन चेतना जगाता है।




