
चलो ढूंढ लें ज़िन्दगी में दो पल सकून के – क्यों सही कहा न मैंने?
जीवन सागर में बह चले जो,
कर्म की पतवार थामें रह गए।
मन ढूँढता ही रह गया दो पल सकून के।
पाषाण खण्ड बहुत मिले, और झंझावात,
उलझ-उलझ कर रह गए, नापी नहीं कोई रात।

हम देखते ही रह गए,
तूफ़ान आकर चला गया।
अपने पीछे अंधाधुंध सवाल छोड़ चला गया।
हम सुलझने के फिराक में जवाब ढूँढते रह गए।
ज़िन्दगी जीने को बस सकून ढूँढते रह गए।
जाने कहाँ हैं गुम गए,
बस हाँथों से फिसलते चले गए।
आए जो तेरी शरण में, सबकुछ समर्पित कर दिया।
फिर ढूँढना सकून भी क्या? वह भी तो तुझमें बस गया।
मैं तुझमें रमती गई,
औ तू मुझमें बस गया।
सुषमा श्रीवास्तव, रुद्रपुर, ऊधम सिंह नगर,उत्तराखंड।




