
मास दिसंबर ज्योंही आए।
तन में आलस भर-भर जाए।
चंदा सूरज नभ के तारे।
गेह दुबक कर बैठे सारे ।।
सब्जी फल का दिखता मेला।
रंग साग का हैअलबेला।
सबके मन को है यह भाता।
हर दिन घर में है बन जाता ।।
पारा नीचे गिरता जाए।
धूप न आए नैन चुराए।।
पंछी बदले अपना डेरा ।
छुपा धुंध में रहे सवेरा।।
ठंडी में सेहत बन जाती ।
भले ठंड यह खूब सताती ।।
नित तिल गुड़ के लड्डू खाना।
सर्दी -खाँसी दूर भगाना।।
स्नान घड़ी आंखे भर आती।
पानी नानी याद दिलाती।।
कौवे जैसा लोग नहाए।
ऊंँहु-ऊँहु होठ कँपकँपाए।।
ओस बूंद नैना को खींचे।
बूढ़ा माली बगिया सींचे।।
कलियांँ खिलकर है मुस्काती।
चपल हवा रह-रह इतराती।
काम रुका है कब मम् भाई।
भले ठिठूरन बढ सी आई।
न हुआ कुछ रोने धोने से।
लक्ष्य मिला है कब सोने से।।
ठंड धनिक को खूब लुभाए।
निर्धन को हर दिवस रुलाए।।
चलो आज यह से भेद मिटा देंगे।
त्योंहि चैन की श्वास भरेंगे।।
किरण कुमारी ‘वर्तनी’ जमशेदपुर




