
वह आती है,
इठलाती–बलखाती हुई
कोमल कलियों के पास
आकर उन्हें सहलाती है
धीरे धीरे–आंख खोलते हैं,
वो अपनी…
फिर उन्हें पुचकारती है -और
रंग भरती है –रंग बिरंगे
जो भाते हैं नयनों को
फिर वो भरती है -अमृत बूंद
जिनसे मिलती, भीनी भीनी सुगंध
वह आती है,
इठलाती –बलखाती हुई ||
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब




