
लड़कपन में बचपना बीता
ग़रीबी में जवानी,
ज़िंदगी से परेशान हूँ
कुछ ऐसी है मेरी कहानी।
दो वक़्त की रोटी के लिए
मैंने घर बार छोड़ा है,
बीवी-बच्चे, रिश्ते-नाते
घर नहीं पुरा परिवार छोड़ा है।
बीवी ज़िम्मेदारी है
मां उससे भी प्यारी है,
बीवी की फ़रमाइशों से
मां की शिकायतों से।
ख़ुद ही ख़ुद से रूठ गया हूँ,
जिम्मेदारियों से बहुत टूट गया हूँ।
मैं पुरुष हूँ!………..
शाम कहीं हो जाती मेरी
और कहीं पे सवेरा है,
परिंदा बिना घोंसले का
यहाँ आज कल वहाँ बसेरा है।
मैं ग़रीब बाप का कंधा हूँ
आँखों के रहते अंधा हूँ,
कपड़े नहीं बदन पर मेरे
भूंखा, प्यासा, नंंगा हूँ।
कमाने को हर रोज़
घर से निकल रहा हूँ,
नींद नहीं आती रातों में
करवटे बदल रहा हूँ।
साँसें थम गई हैं,
फ़िर भी चल रहा हूँ।
मैं पुरुष हूँ!………..
ज्यादा खोया कम मिला है,
मुझे तो हर किसी ने छला है।
स्कूल के फ़ीस से
और बच्चों की पढ़ाई से,
ज़िंदगी से ऊब गया
परेशान हूँ सबकी दवाई से।
नमक, दाल, के भाव चढ़े
तंग आ गए नाई से,
अब पेट नहीं भरते हैं ऐसे
टूटी-फूटी कमाई से।
दर्द ही दर्द मिले हैं मुझको
थे करीब और प्यारों से,
अब तो डर लगता है “रहमत”
भाई के बंटवारों से ।
हां मैं पुरुष हूँ!…..
शेख रहमत अली “बस्तवी”
बस्ती (उ. प्र.)
7317035246




