

भोले नें भोली सूरत से,
मन दुनिया का कैसे मोह लिया,
थोड़ी-सा चंदन तन पे लगा,
और अहं से नाता तोड़ दिया।
भोले नें भोली …
भोले तो भोले भंडारी,
दुनिया की चलाते है गाड़ी,
भक्तों की भीड़ लगाते हैं,
मन देखो कैसे लुभाते हैं।
भोले नें भोली …..
मन प्राण बसे मेरे उर में हैं,
तन की धड़कन धड़काते हैं,
बिन नाम लिए भोले मेरे,
जीवन में आस जगाते हैं।
भोले नें भोली …..
भोले से जब-जब दूर हुए,
नयनों नें आंसू छलकाए ,
जब लौट के भोले घर आए,
खुशियों के आंसू फिर आए।
भोले ने भोली ….
मन की वीणा बजनें लगती,
जीवन का सार सुनाती है,
भोले के संग फिर रहनें का,
अधिकार हमे वो दिलाती है।
भोले ने भोली ….
(258/316 वां मनका)
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कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’
गांधीनगर इन्दौर (म.प्र.) 7869799232




