
धरती की गोद में जब हँसी उतर आई,
हल की नोक से निकली कन्या मुस्काई।
जनक नंदिनी, करुणा की पहली रेखा,
मिथिला की माटी ने बेटी को पहचाना।।
कंचन-सी काया, कोमल-सा स्वभाव,
नेह भरी आँखों में करुणा का अभाव।
चिड़ियों से बतियाती, उपवन में खेली,
हर कण में बसती थी ममता की सहेली।।
बाल्यावस्था में ही धैर्य की पहचान,
सहज, सरल, मौन में छिपा था महान।
दुखी जन देख आँखों में जल भर आता,
नन्ही सीता में भवानी मुस्कुराता।।
पिता जनक ने सीखा उससे राजधर्म,
न्याय, करुणा, त्याग—सबका था मर्म।
नारी नहीं, शक्ति थी स्नेह की धारा,
बचपन में ही रच गई आदर्श सारा।।
धरती की बेटी, धरती-सा धैर्य,
काँटों में भी खिलती रही सत्य-शौर्य।
बाल सीता की यह अमिट पहचान—
सहनशीलता ही उसका था भगवान।।
दिनेश पाल सिंह दिलकश
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




