
भरोसे की नींव पर, टिका था सारा संसार,
पर पीठ पीछे तुमने, किया खंजर से वार।
मीठी बातों में छुपा था कड़वा जहर,
टूट गया सपना जैसे आई हो कोई कहर।
जिन आंखों में वफा का नूर दिखता था,
वहां फरेब का गहरा दस्तूर बिकता था।
साथ निभाने के जो वादे किए थे हजार,
सब निकले झूठे और निकला खोखला प्यार।
वक्त बदला तो गिर गाए चेहरे से नकाब,
सच्चाई देख उड़ गई आंखों की नींद और ख्वाब।
अब दर्द के साए में खुद को संभालता हूं मैं,
धोखे की इस आग में खुद को ढालता हूं मैं।
सबक मिला है कि हर हाथ मिलाने वाला यार नहीं,
दिखावे की इस दुनिया में अब सच्चा प्यार नहीं।
दिल टूटा पर अब खुद की पहचान बनाता हूं,
सच के राह पर आकाश नाम चमकाता हूं।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश




